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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 890

अथवा मानो ऐसे निखिल । मैं पनका मिलता है फल ।
सेवन करती लता वेल । क्रमयोगका वह ॥ १८ ॥
क्रमयोगी चक्रवर्तिके मुकुट पर । रहता है चिद्घन मैं ऐसा अलंकार ।
अपनी जीव-दशा मुझे अर्पण कर । पाया उपलक्षमें ॥ १९ ॥
क्रमयोग प्रासादका । कलश जो है मोक्षका ।
उसके अवकाशका । हुवा जो विस्तार ॥ १२२० ॥
इस संसारके अरण्यमें । क्रमयोगकी इस राहमें ।
जुड जाता मदैक्य ग्राममें । चलने पर जो ॥ २१ ॥
अथवा क्रमयोग ओघ । मिलके भक्त-चित्त गंगौघ ।
पाया स्वानंदोदधि सवेग । मद्रूपका ॥ २२ ॥
यहां तक जो सुवर्म । क्रमयोगकी महिमा ।
तुझसे कहते हम । बार बार ॥ २३ ॥
देश काल और पदार्थ । साधके मुझे पाना पार्थ ।
ऐसा नहीं मैं हूं समस्त । सबका हूं सर्वस्व ॥ २४ ॥
इसलिये हे मदर्थ । न करना कुछ पार्थ ।
मिलता हूं मैं सतत । इस उपायसे ॥ २५ ॥
गीताकी महत्ताका कथन-
एक शिष्य एक गुरु । रूढ यह व्यवहार ।
यह मत्प्राप्ति प्रकार । जाननेमें ॥ २६ ॥
वसुधाके उदरमें अर्जुन । रखा रहता है सिद्ध निधान ।
या अग्निका काठ दूधका स्तन । स्थान है जैसे ॥ २७ ॥
स्वभाव सिद्ध ही यह होता । किंतु उपायसे ही मिलता ।
सिद्ध जो होता वही मिलता । वैसा ही मैं ॥ २८ ॥
फल कहने पर क्या उपाय । कहता है यहां श्रीकृष्णराय ।
इसको कहनेका अभिप्राय । यहां है ऐसे ॥ २९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८१८