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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 880

आत्म-बोधमें ऐसा उद्यम । करते हुए होता है श्रम ।
उसका भी हो जाता है शम । जिस स्थानपे ॥ ९४ ॥
आत्म-बोध प्रसन्नता । कहलाती वह पार्थ ! ।
उसका है भोग लेता । योग-साधक ॥ ९५ ॥
ब्रह्म-प्राप्तिके समयका विवेचन—
उस स्थितिमें शोक करना । किसी वस्तुकी इच्छा करना ।
डूबती यह सब भावना । साम्य-पूरमें ॥ ९६ ॥
उदय होते ही गभस्ति । नक्षत्र-मंडलकी व्यक्ति ।
लोपती है उसकी दीप्ति । जिस प्रकार ॥ ९७ ॥
उदय होते ही आत्म-प्रभा । जो सारी भूत भेद व्यवस्था ।
तोड़ते हुए वह देखता । अपनारूप ॥ ९८ ॥
पाटी पे लिखे अक्षर । जैसे पोंछते हैं कर ।
वैसे खोते भेदांतर । उसकी दृष्टिमें ॥ ९९ ॥
वैसे ही जो अन्यथा ज्ञान । दिखाता जागृति स्वप्न ।
वे दोनों क्रियायें हैं लीन । अज्ञानमें ॥ ११०० ॥
फिर वह भी अज्ञान । बोध बढते ही लीन ।
उस बोधमें संपूर्ण । डूबता है ॥ १ ॥
जैसे भोजनके समय । क्षुधा क्षीणती धनंजय ।
वैसे ही तृप्तिके समय । होती है अस्त ॥ २ ॥
जैसे वेग बढ़ता जाता । वैसे मार्ग घटता जाता ।
फिर जब गंतव्य आता । डूबता मार्ग ॥ ३ ॥
या जागृतिका होता उदीपन । निद्रा क्षीण होते जाती अर्जुन
वैसे ही पूर्ण जागृतिमें मान । निद्राका अंत ॥ ४ ॥
या अपना पूर्णत्व मिलता । चंद्रका बढ़ना ही मिटता ।
शुक्ल-पक्षका भी अंत आता । तब निःशेष ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ८०८