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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 885

वैसे ही बुद्धि हो अथवा दृष्टि । जिसे देखना चाहती किरीटी ।
उस दृष्टिको ही हराके दृष्टि । दिखाती अपनेको ॥ ५५ ॥
दर्पणके पहले अपना मुख । देखनेवाला ही देखता देख ।
उसीको दर्पणमें वही देख - । सकता है जैसे ॥ ५६ ॥
वैसे दृश्य मिटकर द्रष्टा । जैसे मिलता द्रष्टासे द्रष्टा ।
वैसे अकेलेमें नहीं मिटा । द्रष्टापन कभी ॥ ५७ ॥
जैसे स्वप्नकी प्रियाको मान । जगके करना आलिंगन ।
रहता है आपही अर्जुन । प्रियाप्रिय मिलके ॥ ५८ ॥
या दो लकड़ियोंका घर्षण । उससे उठता अग्निकण ।
दोकी भाषा मिटाके अर्जुन । रहता वह एक ॥ ५९ ॥
क्रमयोगी सदैव मुझे भोगता रहता है—
करमें ले अनेक प्रतिबिंब । लेके चलता जब सूर्यबिंब ।
प्रतिबिंबके साथही बिंब । न होता बिंबत्व ॥ ११६० ॥
वैसा मैं होकर देखता । वह दृश्यको ही ले जाता ।
वहां दृश्य भी नहीं होता । द्रष्टापन भी ॥ ६१ ॥
रवि अंधार प्रकाशता । न होती जैसे प्रकाश्यता ।
वैसे दृश्यमें द्रष्टा । मैं होनेसे ॥ ६२ ॥
फिर देखना या न देखना । ऐसी दशाको अनुभवना ।
यह है जो वास्तविक होना । दर्शन मेरा ॥ ६३ ॥
जो कुछ वह देखता । द्रष्टा दृश्यातीत हो पार्था ।
इस दृष्टिसे है भोगता । क्रमयोगी सदा ॥ ६४ ॥
तथा आकाश आकाशसे जैसे । भरकर नहीं हिलता वैसे ।
मैं आत्मासे अपनेमें भी वैसे । होता है उसको ॥ ६५ ॥
कल्पांतमें उदकसे उदक । रोकनेसे सबही जैसे देख ।
रुक जाता वैसे आत्मासे एक । भर जाता वह ॥ ६६ ॥
पैर अपने पर कैसे चढेगा । अग्नि अपनेको कैसे जलायेगा ।
पानी आपही कैसे स्नान करेगा । अपनेसेही ॥ ६७ ॥
८१३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'