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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 877

क्रोध जैसा है महादोष । जिसका होता परिपाक ।
भरनेसे होता अधिक । रीता ही जो ॥ ५८ ॥
वह काम जिस स्थान पर । नष्ट होता उस स्थान पर ।
क्रोध भी सहज धनुर्धर । होता है नष्ट ॥ ५९ ॥
जड़ ही तोड़नेसे जैसे । शाखायें नष्ट होती वैसे ।
वैसे ही कामके नाशसे । नासता है क्रोध ॥ १०६० ॥
इसीलिये वैरी है जो काम । उसीका मिटाया जब नाम ।
मिटता जैसे गमनागम । क्रोधका भी ॥ ६१ ॥
जैसे अपना अड़गोड़ा समर्थ । अपराधीके सिरपे होता पार्थ ।
वैसे भोग देकर होता समर्थ । परिग्रह ॥ ६२ ॥
वैसे ही खुगीर सिरपे देता । अंगांगमें अवगुण भरता ।
जीवके हाथमें लकड़ी देता । ममत्वकी जो ॥ ६३ ॥
शिष्य-शाखादि विलाससे । मठ मुद्रादि बहानेसे ।
डाले हैं जो इसने फांसे । असंगों पर भी ॥ ६४ ॥
घरमें कुटुंब रूपसे रहता । वनमें वन्य बन अवतरता ।
नग्न शरीरको भी चिपकता । पांडुकुमार ॥ ६५ ॥
अपरिग्रह जो ऐसा दुर्जय । उसपे भी पाकर विजय ।
भव विजयका धनंजय । आता उत्साह ॥ ६६ ॥
अमानित्वादि जो संपूर्ण । ज्ञानके होते सभी गुण ।
वैफल्य देशके प्रधान । होते हैं जैसे ॥ ६७ ॥
सम्यग्ज्ञानका राज्य अर्पण । करके वे सभी गुणगण ।
उसके परिवार भूषण । होके रहते हैं ॥ ६८ ॥
तब प्रवृत्तिके राज-पथमें । अवस्था-भेद प्रमदियां आपमें ।
दीठ उतारती प्रति-पगमें । अपने सुखकी ॥ ६९ ॥
बोधके दंडसे विवेक जब । दृश्योंकी भीड हटाता सब ।
योगकी भूमिका आके तब । आरती उतारती ॥ १०७० ॥
८०५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग