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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 689

रहने दो यह अधो शाख । संसार रूप जो यह रूख ।
उसका यह मूल-पुरुष । जो है अक्षर ॥ ५२० ॥
यह पुरुष क्यों कहलाता । अपने पूर्णत्वमें होता ।
तथा मायापुरीमें है सोता । इससे ही ॥ २१ ॥
और है विश्वका आना जाना । विपरीत ज्ञानका रूप माना ।
इसने है जिसको नहीं जाना । यह है सुषुप्ति ॥ २२ ॥
तभी यह स्वभावता । क्षरना नहीं जानता ।
तथा नाश नहीं होता । ज्ञानके बिन ॥ २३ ॥
इसीलिये यह अक्षर । वेदोंमें पांडुकुमार ।
वेदांत प्रसिद्ध डोंगर । हुवा सिद्धांत ॥ २४ ॥
ऐसे जीव कार्य कारण । जिसे माया संग लक्षण ।
अक्षर पुरुष है जान । चैतन्य जो ॥ २५ ॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७ ॥
तीसरे पुरुषोत्तमका विवेचन—
अब जो अन्यथा ज्ञानकी । अवस्थायें हैं दो-जनकी ।
खो जाती है वह निद्राकी । अज्ञान-स्थितिमें ॥ २६ ॥
वह अज्ञान जब ज्ञानमें डूबता । तथा वह ज्ञान भी कीर्तिमुख होता ।
जैसे काष्ठ जलाकर स्वयं जलता । वह्नी आप ॥ २७ ॥
ऐसे वह अज्ञान ले गया ज्ञान । पर-तत्व दे गया आप अर्जुन ।
जाननेके बिना रहा ऐसे ज्ञान । केवल मात्र ॥ २८ ॥
कहाता परमात्मा जो तीजा पुरुष उत्तम ।
विश्व-पोषक विश्वात्मा है विश्वेश्वरं अव्यय ॥ १७ ॥
(78) ६१७ पुरुषोत्तमयोग