ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९ ॥
यहां अथवा स्वर्गमें फिर । लेता जिस देहका आधार ।
करता है वैसा ही विस्तार । मन-इंद्रियोंका ॥ ६८ ॥
जैसे बुझते ही ज्योति । ले जाती अपनी दीप्ति ।
फिर जब है जलती । वैसा ही प्रकाश ॥ ६९ ॥
किंतु ऐसे है जो परिवर्तन । करते अविवेकीके नयन ।
जानते इतना तो अर्जुन । सामान्य बात ॥ ३७० ॥
आत्मा है जो शरीरमें आया । उसीने विषय भोग किया ।
या वही शरीर छोड़ गया । इतना जानते ॥ ७१ ॥
वैसे आना तथा जाना । करना है या भोगना ।
देहका कार्य है माना । उसने आत्माका ॥ ७२ ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्तिज्ञानचक्षुषः ॥ १० ॥
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११ ॥
योगी आत्म-धर्म आत्मामें तथा देह-धर्म देहमें देखता है—
किंतु छोटासा देह उत्पन्न । तथा देख उसमें चेतन ।
या उसमें देख आंदोलन । कहते वह आया ॥ ७३ ॥
श्रोत्र जिह्वा त्वचा चक्षु घ्राण औ' साथ हो मन ।
आधार इनका लेके सारे विषय भोगता ॥ ९ ॥
तजता धरता देह भोगता गुण-युक्त जो ।
न देखते इसे मूढ देखते ज्ञान चक्षु ही ॥ १० ॥
यत्नसे देखते योगी इसको हियमें बसे ।
चित्त-हीन अशुद्धात्मा यत्नसे भी न देखते ॥ ११ ॥
६०३ पुरुषोत्तमयोग