ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 679, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४ ॥
प्राणिमात्रके नाभि-कंदपर । अंगीठी बनके पांडुकुमार ।
जलता हूं मैं दीप्ति बनकर । जठरमें सदैव ॥ ७ ॥
धौंकनी बनाकर प्राणापान । फूंकता रहता हूं रात दिन ।
पचा डालता मैं कितना अन्न । इसी उदरमें ॥ ८ ॥
शुष्क अथवा स्निग्ध । सुपक्व या विदग्ध ।
किंतु मैं चतुर्विध । पचाता अन्न ॥ ९ ॥
ऐसे मैं ही हूं सकल जन । जीवनका हूं सार-जीवन ।
औ' जीवनका मुख्य-साधन । वैश्वानर मैं हूं ॥ ४१० ॥
कहूं क्या इससे अधिक पार्था । मेरी सर्व-व्यापककी कथा ।
विश्वमें दूसरा नहीं सर्वथा । मेरे बिन कुछ भी ॥ ११ ॥
संसारमें कुछ सुखी और कुछ दुखी क्यों ? -
किंतु इसका कारण । सदा सुखी हैं कुछ जन ।
तथा कुछ दुःख मगन । दीखते यहां ॥ १२ ॥
अजी ! संपूर्ण नगरमें जैसे । दीप जलते एक ही दीपसे ।
किंतु कुछ जलते उसमेंसे । कुछ बुझते क्यों ? ॥ १३ ॥
यहां करता ऐसा संशय । तेरा मन यदि धनंजय !
अबका है उत्तम समय । संदेह निवृत्तिका ॥ १४ ॥
मैं भर रहा यहां संपूर्ण । इसमें अन्यथा नहीं जान ।
जिसका जैसा अंतःकरण । दीखता वैसे ॥ १५ ॥
जैसे आकाशध्वनि है जो एक । गूंजता नाद बन अनेक ।
भिन्न भिन्न वाद्योंमेंसे तू देख । धनंजय ॥ १६ ॥
वैश्वानर बना मैं ही जीवोंके तन में बसा ।
पचाता अन्न चारो ही प्राण अपान फूंकके ॥ १४ ॥
५०७ पुरुषोत्तमयोग