ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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विश्वंका होता है संपूर्ण अस्त । न होता आत्म-बोध प्रकाशित ।
ऐसी अज्ञान दशा मात्र पार्थ । अक्षर नामकी ॥ ८ ॥
- “अजा” कहनेसे जन्म नहीं । अजन्माको मृत्यु कैसी कहीं ।
इसीलिये अक्षर सही । अज्ञान घन ॥ ९ ॥
जैसे सर्व कला रहित । चन्द्रमा जो मूल रूपित ।
दीखे अमावासके रात । वैसे ही यह ॥ ५१० ॥
होते ही सर्वोपाधि विनाश । लीन होती जहां जीव-दशा ।
फल पाकरके वृक्ष-दशा । बीजमें जैसे ॥ ११ ॥
वैसे उपाधि उपाहित । ये दोनों होते हैं विलुप्त ।
उसको कहते अव्यक्त । पांडुकुमार ॥ १२ ॥
जिसको है बीज भाव । वेदांतमें दिया नांव ।
उस पुरुषका ठाव । अक्षरका ॥ १३ ॥
जहांसे है अन्यथा ज्ञान । फैलकर जागृति स्वप्न ।
नानात्व-बुद्धिमें अर्जुन । घुसे हैं सब ॥ १४ ॥
जहांसे उठता जीवत्व । तथा उठाकर जो शिवत्व ।
इन दोनोंका जहां लयत्व । वह अक्षर पुरुष ॥ १५ ॥
तथा अक्षर पुरुष जनमें । खेलता है जागृति-स्वप्नमें ।
या दोनो अवस्थायें उनमें- । से प्रसवती हैं ॥ १६ ॥
जो है आज्ञानघन सुषुप्ति । ऐसी है उसकी प्रख्याति ।
इसे कहते ब्रह्म-प्राप्ति । यदि न्यून न होता ॥ १७ ॥
वास्तवमें यदि यह पार्था । स्वप्न-जागृतिमें नहीं आता ।
ब्रह्म-भाव ही कहा जाता । इसको ही ॥ १८ ॥
किंतु प्रकृति पुरुष ये दोनों । मेघ बन आये नभमें मानो ।
क्षेत्र-क्षत्रज्ञ ये स्वप्नमें दोनों। दीखते निद्रामें ॥ १९ ॥ - अजामेकम् श्रुतिवचन—
ज्ञानेश्वरी ६१६