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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 676

वैसे ही इंद्रियां उसके साथ । करती अपना व्यापार पार्थ ।
उसको कहते लोग यथार्थ । मोगना ऐसे ॥ ७४ ॥
भोग-क्षीणसे पीछे स्वाभाविक । शरीर गिरता है यह देख ।
वह गयारे गया ऐसे चीख-। कहते हैं बंसे ॥ ७५ ॥
जैसे देखके वृक्ष हिलता । कहते हैं पवन बहता ।
किंतु जहां वृक्ष नहीं होता । नहीं क्या पवन ॥ ७६ ॥
या रखकर सम्मुख दर्पण । उसमें कर अपना दर्शन ।
भासता आप हुवा है उत्पन्न । उससे पूर्व नहीं क्या ॥ ७७ ॥
या परे हटाके दर्पण । अपना लोप हुवा मान ।
आप नहीं ऐसे अर्जुन । ऐसा मानना क्या ॥ ७८ ॥
शब्द है जैसे आकाशका । किंतु माना जाता मेघका ।
या चंद्रके वेग अभ्रका । करता आरोप ॥ ७९ ॥
वैसे शरीरका आवगमन । निर्विकार आत्मापे आरोपण ।
करते हैं वे भ्रमसे अर्जुन । निश्चय-पूर्वक ॥ ३८० ॥
आत्मामें यहां आत्म-धर्म । तथा देहमें देह-धर्म ।
जानते जो इसका मर्म । वे हैं दूसरे ही ॥ ८१ ॥
ज्ञानसे हैं जिसके नयन । देखते हैं आत्म भेदके तन ।
मेघ-भेदमैं सूर्य-कीरण । ग्रीष्ममें जैसे ॥ ८२ ॥
वैसे ही कर विवेक विस्तार । ज्ञानियोंकी बुद्धि होती है स्थिर ।
देखते आत्माको वैसे ही धीर । इस भांतिसे ॥ ८३ ॥
जैसे तारागणसे भरा गगन । जलमें पडा है दीखता अर्जुन ।
किंतु नहीं पडा टूटके गगन । यह जानते वैसे ॥ ८४ ॥
गगनके स्थानपे है गगन । यह केवळ है आभास जान ।
वैसे हैं आत्म-शरीर भिन्न । मानते हैं वे ॥ ८५ ॥
कलकल बहते पानीमें चंचल । दिखती है चांदनीकी जो हलचल ।
चांदनी होती चंद्रके साथ निश्चल । जानके देखते हैं ॥ ८६ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०४