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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 677

या डबरा ही भरता सूखता । सूर्य जैसेका वैसा है रहता ।
वैसे ही शरीर आता औ' जाता । देखते हैं ऐसे ॥ ८७ ॥
घट मठ बनाये । वैसे ही तोड़ दिये ।
आकाश रह गये । सदा अखंड ॥ ८८ ॥
वैसे अखंड आत्म-सत्ता । तन है जो आता जाता ।
अज्ञान-दृष्टिसे कल्पित । जानते हैं ज्ञानी ॥ ८९ ॥
चैतन्य न बढ़ता न घटता । वह कर्म न करता कराता ।
ऐसे आत्म-ज्ञानसे है जानता । शुद्ध-रूपसे ॥ ३९० ॥
तथा स्वाधीन होगा संपूर्ण ज्ञान । प्रज्ञा परमाणुका अंतदर्शन ।
सकल शास्त्रोंका रहस्य अर्जुन । किसी समय ॥ ९१ ॥
किंतु है ऐसी इसकी उत्पत्ति । मनमें न रही यदि विरक्ति ।
होती कभी सर्वात्मकी प्राप्ति । विद्वत्तासे ॥ ९२ ॥
मुखमें भरा है सदैव ज्ञान । अंतःकरणमें विषयोंका स्थान ।
इससे न होगी प्राप्ति अर्जुन । मेरी कभी ॥ ९३ ॥
करनेसे ग्रंथ पठन । टूटेगा भव-बंधन ।
करनेसे ग्रंथ स्पर्शन । होगा क्या पाठ ? ॥ ९४ ॥
आंखमें पट्टी बांधकर । नाकसे मोति सूंघकर ।
समझेगा क्या धनुर्धर । उसका मूल्य ॥ ९५ ॥
वैसे चित्तमें अहंताका स्थान । जिह्वा पर शास्त्र संपूर्ण ।
इससे नहीं होगा मेरा ज्ञान । करोड़ों जन्मोंमें ॥ ९६ ॥
मैं अकेला सबमें भरा हुवा हूं—
एक हूं मैं सबमें व्याप्त । भूतमात्रमें हूं समस्त ।
कहता हूं मैं यही बात । स्पष्ट रूपसे ॥ ९७ ॥
६०५ पुरुषोत्तमयोग