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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 691

सोऽहम् भाव है अस्त होता । कहनेवाला कोई न होता ।
दृष्टत्व सह जाना है पार्थ । जाना दृश्य भी ॥ ४२ ॥
बिंब तथा है प्रतिबिंबकी । न ले सकते प्रभा बीचकी ।
कहना नहीं प्रभा कहांकी । ऐसे कभी ॥ ४३ ॥
घ्राण तथा पुष्पके मध्य । सुवास रहता है हृद्य ।
आंखोंसे दीखना असाध्य । उसे ना कहना ॥ ४४ ॥
वैसे दृश्यादृश्य दोनों मिटता । फिर क्या है यह कौन कहता ।
इसी अनुभवसे है देखता । वह जो रूप ॥ ४५ ॥
वह है प्रकाश बिन प्रकाश । ईशितव्यके बिना है जो ईश ।
अपनेसे भरता अवकाश । आप ही सारा ॥ ४६ ॥
नादसे जो सुनना नाद । स्वादसे है चखना स्वाद ।
अनुभवना जो आनंद । आनंदसे ही ॥ ४७ ॥
सुख ही जहां सुख पाता । तेजसे है तेज मिलता ।
शून्य भी जहां डूब जाता । महाशून्यमें ॥ ४८ ॥
पूर्णताका जो परिणाम । पुरुष वह सर्वोत्तम ।
विश्रांतिका भी है विश्राम । जहां लेता विश्रांति ॥ ४९ ॥
विकार पर भी जो रहता । ग्रासको ग्रासकर पूर्णता ।
बहुतसे जो बहुत होता । बहुत गुना ॥ ५५० ॥
चैतन्य विश्वाकार कैसे दीखता है ?—
जो अज्ञानीके प्रति । रजतकी प्रतीति ।
चांदी न होके शुक्ति । करती जैसे ॥ ५१ ॥
अथवा जो अलंकार रूपमें । न छिपके सोना छिपता उसमें ।
विश्व न होकर भी वैसे विश्वमें । वह है विश्वाधार ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जल तरंग । पानीसे रहता है अभंग ।
वैसे प्रतीत करता जग । वह है प्रकाश ॥ ५३ ॥
६१९ पुरुषोत्तमयोग