ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा पथ कर घ्राण । देहेश करता गमन ।
फिर जो गंधके दारुण । अरण्य लांघता ॥ ५९ ॥
ऐसे वह इंद्रिय नायक । करके मनको सहायक ।
शोधते जाता है शब्दादिक । विषय सारे ॥ ३६० ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
जाते समय जीव इंद्रियोंके साथ जाता है—
किंतु ऐसे कर्ता भोक्ता । जिवन-रूप दीखता ।
जैसे तनमें करता । यह प्रवेश ॥ ६१ ॥
अजी! कोई विलासी तथा धनिक । जाना जाता है उसी समय देख ।
बसता है जब वह हो स्थाइक । राजधानीमें ॥ ६२ ॥
वैसे बढ़ता कर्तृत्व अहंकार । विषयेंद्रिय-तांडव धनुर्धर ।
जाना जाता है तभी पाता शरीर । जब यह जीव ॥ ६३ ॥
अथवा छोड़ता है शरीर । तब इंद्रियां निकाल कर ।
अपने ही साथ धनुर्धर । ले जाता है ॥ ६४ ॥
जैसे अपमानित अथिति । ले जाता है सुकृत-संपत्ति ।
या ले जाता है गुड्डेकी गति । सूत्र-तंतू ॥ ६५ ॥
अथवा प्रकाश अस्तमान । ले जाता है सबका दर्शन ।
अथवा है सुगंध पवन । ले जाता जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे मन सह इंद्रियां । देह-राज है धनंजय ।
शरीर तजते समय । ले जाता है ॥ ६७ ॥
जैसे पुष्पादिसे वायु ले जाता गंध खींचके ।
वैसे लेकर ये ईश छोड़ता धरता तन ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०२