सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 678, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 678

यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥ १२ ॥
वैसे सूर्य सह जो संपूर्ण । विश्वकी रचना है अर्जुन ।
प्रकाश वह मेरा ही जान । आद्यंत है जो ॥ ९८ ॥
जल सोखकर लेता सविता । जलांश जो बादमें है रहता ।
चंद्रमें रहती है जो पांडुसुता । जोस्ना वह मेरी ॥ ९९ ॥
तथा दहन पचन सिद्धि । करता रहता निरवधि ।
हुताग्नै वह तेजोवृद्धि । जान मेरी ही ॥ ४०० ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३ ॥
प्रवेश किया मैंने भूतलमें । तभी यह महासिंधु जलमें ।
नहीं पिघला है युग-युगमें । मृत्तिका पिंड ॥ १ ॥
तथा भूत ही स-चराचर । धरा है धरतीने अपार ।
पृथ्वी-तलमें प्रवेश कर । उसको धरा मैंने ॥ २ ॥
गगनमें मैं पांडुसुत । चंद्रके रूपसे अमृत ।
भरा हुवा मैं स्वचलित । बना सरोवर ॥ ३ ॥
वहांसे निकलते रश्मिकर । उनको धरकर मैं अपार ।
सभी वनस्पतियोंका आगर । भरता रहता मैं ॥ ४ ॥
इससे सस्यादिक सकल । करते धान्यादिका सुकाल ।
तथा अन्नादिसे प्रतिपाल । करता सबका ॥ ५ ॥
सकल जन जीवनका जीवन 'वैश्वानर' मैं हूं—
ऐसे उत्पन्न किया हुवा अन्न । जिस भांति करके मैं दीपन ।
जिससे जीवका हो समाधान । करता हूं ऐसे ॥ ६ ॥
सूर्यमें जलता तेज विश्वको है प्रकाशता ।
चंद्रमें अग्निमें वैसे मेरा ही तेज जान तू ॥ १२ ॥
धृतिके बलसे भूत धरता मैं धरा बना ।
पोसता वनस्पतीको रससे भर सोम मैं ॥ १३ ॥
ज्ञानेश्वरी ६०६