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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 693

अथवा माला हाथमें लेनेसे । सर्पाभास भय मिटता जैसे ।
मेरे पुरुषोत्तमत्व-बोधसे । जगाभाससे छूटता ॥ ६१ ॥
अलंकार सोनेका है जो जानता । अलंकारके मोहमें नहीं आता ।
उसी भांति मुझको जो है जानता । छूटता भिन्नत्व ॥ ६२ ॥
फिर सर्वत्र सच्चिदानंद । कहता मैं एक स्वयं सिध्द ।
अपनेमें अन्य कोई भेद । नहीं जानता ॥ ६३ ॥
उसीसे है सब जाना । अल्प है यह कहना ।
उसके लिये तू जान । नहीं रहा द्वैत ॥ ६४ ॥
इसलिये मेरा भजन । वही एक योग्य है जान ।
गगन जैसा अलिंगन । करता गगनका ॥ ६५ ॥
जैसे क्षीर-सागरको भोजन । दे सकता क्षीर-सागर बन ।
या अमृत होकर ही मिलन । अमृतसे जैसे ॥ ६६ ॥
मिलानेसे सुवर्ण शुध्द । मिलता है सुवर्ण शुध्द ।
वैसे मैं बनकर सिध्द । मेरी भक्ति ॥ ६७ ॥
अजी ! सिंधु रूप यह नहीं होती । गंगा सिंधुसे कहो कैसे मिलती ।
इसीलिये मैं न बनकर भक्ति- । में कैसा प्रवेश ॥ ६८ ॥
इसीलिये हे सभी प्रकार । कल्लोल अनन्य है सागर ।
ऐसे मुझसे हे धनुर्धर । भजता है जो ॥ ६९ ॥
जैसे सूर्य और प्रभा । एक रूप और लोभ ।
वैसे ही योग्यता लाभ । उस भजनका ॥ ६७० ॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्बुध्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥ २० ॥
ऐसा गूढ कहा शास्त्र निष्पाप तुझसे यह ।
इसको जानके धीर होते हैं कृत कृत्य ही ॥ २० ॥
६२१ पुरुषोत्तमयोग