ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
न छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर ।
तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥
कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर ।
होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥
जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य ।
वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥
लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध ।
जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥
जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर ।
वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥
ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे ।
होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥
भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे ।
गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥
गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता ।
उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥
रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें ।
वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥
तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर ।
बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥
उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल ।
दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥
अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक ।
वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥
जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके ।
वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७६
तथा झडीसे आषाढ़की । झरनी खाई पहाड़की ।
वैसे मुखसे लारकी । बहेगी धार ॥ ६७ ॥
बोल तुतला घिघियायेंगे । कान तुतुने बधिरायेंगे ।
पिंड जकड कुम्हलायेगा । मानो बानर-सा ॥ ६८ ॥
खेतोंमें हौवा जैसे घासका । कांपता खाके झोंका हवाका ।
वैसे हाल होगा सर्वांग शरीरका । उस समय ॥ ६९ ॥
पैरमें पैर अटकेंगे । हाथ कांप सकुचायेंगे ।
शरीर-कर्म उपहासेंगे । अपने आपको ॥ ७० ॥
होंगे मलमूत्रादिके द्वार । जैसे टूटे घडेके खापर ।
और मेरे निधनमें इतर । करेंगे मनौतियां ॥ ७१ ॥
यह देखके कोसेगा जग । होगा तब मृत्युका वियोग ।
आप्त-जन करेंगे उबग । तब मेरा ॥ ७२ ॥
स्त्रियां कहेंगी मुझको भूत । सुन होंगे बालक मूर्छित ।
इससे बनूंगा मैं सतत । घृणा-पात्र ॥ ७३ ॥
रातमें खांसीका उबाल । सोये हुये सुन सकल ।
“कितनोंको खायेगा काल” । कहेंगे “न जाने यह” ॥ ७४ ॥
वार्धक्यका ऐसा विज्ञापन । देख होता वह सावधान ।
तारुण्यमें ही उसका मन । होता उपशम ॥ ७५ ॥
कहता यह कल आयेगा । आजका भोगमें बीतेगा ।
आत्म-हितमें क्या रहेगा । अपने पास ॥ ७६ ॥
आनेसे पहले बधिरता । सुनने-योग्य सब सुनता ।
जब तक पंगु नहीं होता । करता देशाटन ॥ ७७ ॥
जब तक दृष्टि रहती । देखने योग्य देख लेती ।
जब तक वाचा रहती । गाता मंगल-गान ॥ ७८ ॥
हाथ होंगे ये तब बधिर । जान करता अब अधीर ।
सत्कर्मको वह निरंतर । दानादिक ॥ ७९ ॥
४७७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऐसा होगा तब सकल । मन होगा जान पागल ।
ध्यान-मग्न होता निश्चल । आत्म-ज्ञानमें ॥ ५८० ॥
चोर आयेंगे दिनमें जो जानता । तभी संपत्तीकी व्यवस्था करता ।
दीप बुझनेसे पहले लगाता । वस्तु सुचारु रूपसे ॥ ८१ ॥
वैसे वार्धक्य कल आयेगा । यह सब ही व्यर्थ जायेगा ।
तारुण्यमें ही कर रखेगा । सभी व्यवस्था ॥ ८२ ॥
अति दुर्गम-पथ यह जान । संध्याकाल कर अवलोकन ।
आप मात्र निकला जो अर्जुन । क्या करेंगे चोर ॥ ८३ ॥
ऐसी जराकी आहट पाकर । जो व्यर्थ न हो यह जानकर ।
बैठा है शत-वृद्ध बनकर । उसको डरना क्या ? ॥ ८४ ॥
फटकी बालोंको फटकना । उससे न निकलना दाना ।
या राखको ही फिर जलाना । इससे होगा क्या ? ॥ ८५ ॥
करके वार्धक्यका विचार । किया उसका प्रभाव दूर ।
उसके पास ज्ञान अपार । रहता सदैव ॥ ८६ ॥
वैसे ही नहीं जब अनेक रोग । जिसके नहीं व्यापते सभी अंग ।
तभी वह आरोग्यका उपयोग । करता सदैव ॥ ८७ ॥
अजी ! सांपके मुखसे । गिरा हुवा कौर जैसे ।
तज देता सदा वैसे । बुध्दिमान ॥ ८८ ॥
जिसके वियोगसे दुःख । बढ़ते विपत्ति औ' शोक ।
तजके वैसे स्नेह-सुख । रहता उदासीन ॥ ८९ ॥
अजी ! दोष स्पर्शेंगे कैसे । न करता कर्म जो वैसे ।
नियमित कर्मेंद्रियोंसे । रोकके रहता ॥ ५९० ॥
ऐसे अनेक युक्तिसे । रहता है दक्षतासे ।
ज्ञान-संपत्तिका उसे । मानो स्वामी ॥ ९१ ॥
अब और ही एक । लक्षण अलौकिक ।
कहता सुन नेक । धनंजय ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७८
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥
१३ ज्ञानके लक्षण, अनासक्ति -
वह अपने शरीर पर । उदास होता इस प्रकार ।
पथिक पराये वस्तु पर । बैठा हो रक्षक ॥ ९३ ॥
या जैसे है साया वृक्षकी । क्षण भर मिली राहकी ।
घर पर नहीं उसकी । ममता उतनी भी ॥ ९४ ॥
सायाकी भांति रहता है जैसे । रह कर भी न जानता वैसे ।
रहता है अलोलुप भावसे । पत्नीमें नित ॥ ९५ ॥
वैसे ही संतानके विषयमें । रहता जैसे पंथी पड़ावमें ।
अथवा गोरु वृक्षकी सायामें । बैठ जाते हैं ॥ ९६ ॥
यदि वह रहता श्रीमंत । ऐसे रहता है पांडुसुत ।
जैसे रहा कोई साक्षीभूत । किसीके धनका ॥ ९७ ॥
या तोता जैसे पिंजडेमें । रहना स्वामीकी आज्ञामें ।
ऐसे वह वेद-आज्ञामें । रहता हो विधेय ॥ ९८ ॥
वैसे ही गृह-दारा-पुत्र- । बना नहीं रखते मित्र ।
उसको तू जान पवित्र । नींव-ज्ञानकी ॥ ९९ ॥
१४ ज्ञानके लक्षण, अखंड सम-चित्तता—
तथा महा-सिंधु जैसे । ग्रीष्म-वर्षा में एकसे ।
इष्ट अनिष्ट भी वैसे । जानता नहीं ॥ ६०० ॥
या तीन कालमें नहीं होता । तीन प्रकारका सविता ।
वैसे सुखदुःखमें रहता । समचित्त वह ॥ १ ॥
निःसंग वृत्ति कर्मोंमें पुत्रादिमें अलिप्तता ।
प्रिय अप्रिय लाभोंमें अखंड समचित्तता ॥ ९ ॥
४७९
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
जहां आकाशकी भांति । साम्यमें खामी न आती ।
जान तू सुभद्रापति । वहां है ज्ञान ॥२॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥
१५ ज्ञानका लक्षण, निष्काम एकनिष्ठ भक्ति—
वैसे ही बिना मेरे कहीं । श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं ।
ऐसा दृढ निश्चय सही । जिसने किया ॥ ३ ॥
काया-वाचा तथा मनसे । कृत-निश्चय किया ऐसे ।
मेरे बिना दूसरा ऐसे । नहीं देखते ॥ ४ ॥
या जिसने अपना मन । किया पूर्ण मुझमें लीन ।
एकत्वमें शय्या-समान । कर लिया है ॥ ५॥
चितामें जाते समय सती । अन्य न सोचती बिना-पति ।
ऐसे उसकी केवल गति । एकमात्र मैं हूं ॥ ६॥
मिल कर भी जो मिलता रहता । सागरसे नित प्रवाह सरिता ।
मैं बन कर भी मुझको भजता । वैसे वह सदैव ॥ ७ ॥
जैसे सूर्यके साथ उदय होता । वैसे उसके साथ अस्त होता ।
यह पारतंत्र्य ही जैसे शोभता । प्रभाको सदैव ॥ ८ ॥
पानीकी सतह पर । उठता है पानी सुंदर ।
उसे कहते लहर । वैसे वह पानी ही ॥ ९ ॥
अनन्य जो इस प्रकार । हुवा है नित मुझपर ।
मूर्तिमंत है धनुर्धर । ज्ञान-रूप जो ॥ ६१० ॥
१६ ज्ञानका लक्षण, सदा एकांतमें प्रीति—
होती सदा चाह उसकी । तीर्थ-क्षेत्रोंमें रहनेकी ।
वन-गुहामें एकांतकी । धनंजय ॥ ११ ॥
मुझमें हो अनन्यत्व भक्ति निष्काम निश्चल ।
एकांतमें रहे प्रीति अरुचि जन-संगमें ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी ४८०
शैल-कक्षाके गह्वर । जलाशय परिसर ।
किंतु न चाहे शहर । रहनेके लिये ॥ १२ ॥
एकांत पर उसकी प्रीति । जन-संगमें है अ-प्रवृति ।
जान तू मनुष्याकार-मूर्ति । ज्ञानकी वह ॥ १३ ॥
कहता ज्ञानके लक्षण । और भी मैं तुझे अर्जुन ।
तू है अत्यंत बुद्धिमान । सुनो इसे ॥ १४ ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
१७-१८ ज्ञानका लक्षण, अध्यात्म-ज्ञान, ज्ञेय-दर्शन--
अजी ! परमात्म ऐसे । वस्तु होती है जिससे ।
दर्शन होता है उसे । कहते हैं ज्ञान ॥ १५ ॥
इस एक ज्ञानके बिन । स्वर्ग-दायक आदि ज्ञान ।
मानना है वह अज्ञान । निश्चय-पूर्वक ॥ १६ ॥
स्वर्गकी बात वह छोडता । संसारसे नाता ही छोडता ।
अध्यात्म-ज्ञानमें डूब जाता । सद्भावकासे ॥ १७ ॥
पथिक जैसे चौराहे पर । दूसरे पथोंको तज कर ।
चलता अपने पथ पर । वैसे ही वह ॥ १८ ॥
कर ज्ञान मात्रका निरीक्षण । दूसरे सबका निराकरण ।
स्वीकार करता केवल आत्म-ज्ञान । अपने मन-बुद्धिसे ॥ १९ ॥
कहता है सही यह एक । अन्य सभी है भ्रांति-मूलक ।
ऐसी मति कर स्थिर देख । रहता मेरु-सा ॥ ६२० ॥
ऐसा निश्चय जिसका । आत्म-ज्ञान विषयका ।
ध्रुव जैसा गगनका । वैसा रहता ॥ २१ ॥
अध्यात्म-ज्ञानमें श्रध्दा तत्वत' ज्ञेय-दर्शन ।
कहा है इसको ज्ञान अज्ञान विपरीत जो ॥ ११ ॥
४८१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(61)
ऐसे ही मनुष्योंमें ज्ञान । रहता निःसंशय जान ।
ऐसा ही मन-ज्ञान-लीन । होता है मद्रूप ॥ २२ ॥
बैठनेके बाद होनेका जो हो जाता । वह सब बैठते ही नहीं होता ।
किंतु ज्ञानमें मन स्थिर हो जाता । बनता ज्ञानी वह ॥ २३ ॥
तथा तत्व-ज्ञान निर्मल । फलता जो एक ही फल ।
ज्ञेय पर ही जो सरल । जम जाती दृष्टि ॥ २४ ॥
वैसे बोध हुवा जो ज्ञान । हुवा नही ज्ञेय दर्शन ।
नहीं मिला उसको ज्ञान । ऐसे मानते हम ॥ २५ ॥
अंधेके हाथमें दीप देनेसे । क्या लाभ होगा उसको उससे ।
कुछ न दीखता जिस दीपसे । लाभ ही क्या भला ॥ २६ ॥
अजी ! प्रकाश जब ज्ञानका । न कराता दर्शन ज्ञेयका ।
उससे क्या लाभ है किसका । निरर्थक-बुद्धि ॥ २७ ॥
जिससे-ज्ञेय दर्शन । करता सर्वत्र मन ।
वही शुद्ध-बुद्धि जान । धनंजय ॥ २८ ॥
˙वही है निर्दोष ज्ञान । जिससे ज्ञेय दर्शन ।
वही है ज्ञान-संपन्न । हुवा पार्थ ॥ २९ ॥
जितनी ज्ञानकी वृद्धि । उतनी है उसकी बुद्धि ।
उसको शब्दसे सिद्धि । करना व्यर्थ ॥ ६३० ॥
ज्ञान प्रकाशके साथ । बुद्धि ज्ञेयसे सतत ।
चिपकती वही पार्थ । पाता पर-तत्व ॥ ३१ ॥
ज्ञानेश्वरकी सहज काव्य स्फूर्ति—
उसीको मैं यदि ज्ञान कहता । इसमें विस्मय क्या पांडुसुत ।
अजी ! सविताको कहो सविता । नहीं कहें क्या ॥ ३२ ॥
तब कहते हैं सब श्रोता । विस्तार न कर ज्ञानी-वार्ता ।
ग्रंथार्थमें यह बाधा लाता । क्यों भला व्यर्थकी ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८२
हमें यह तेरा मधुर । वक्तृत्वका पाहुनाचार ।
ज्ञानका कराया साकार । शब्द-दर्शन ॥ ३४ ॥
रस होना है अति मात्र । लिया है तूने कवि मंत्र ।
बुलाके हमें यह तंत्र । करता क्यों शत्रुताका ॥ ३५ ॥
प्रेमसे भोजनमें बुलाया । सजाके पंगतमें बिठाया ।
और सभी पकवान्न भगाया । इससे मिला क्या ॥ ३६ ॥
गाय है सुंदर पुष्ट बछडा साथ । काह्यमें हाथ लगाते मारती लाथ ।
कौन पालेगा कहो उसे समर्थ । व्यर्थ ही घरमें ॥ ३७ ॥
वैसे ज्ञानमें मति नहीं प्रकाशती । जल्पोंमें व्यर्थ स-कौतुक दौडती ।
वैसे तूने अन्य कवि-गणकी भांति । तिहीं किया निरूपण ॥ ३८ ॥
पानेके लिये जो कुछ ज्ञानांश । करता योग-यागादि सायास ।
उस ज्ञानका तूने किया स-उल्हास । योग्य-निरूपण ॥ ३९ ॥
अमृत मिला जैसे सतत । इससे ऊबेगा कोई तात ।
या सुखके दिनका गणित । करेगा क्या कोई ॥ ४० ॥
या पूर्ण चंद्रकी रात । आयेगी युग-पर्यंत ।
कहेगा उसे क्या व्यर्थ । कभी चकोर ॥ ४१ ॥
वैसे हैं ज्ञानके बोल । वह भी ऐसे रसाल ।
कौन कहेगा अकुशल । हुवा बहु ॥ ४२ ॥
आता जब भाग्यशाली अतिथि । परोसती गृहिणी दैववती ।
रसौयी चुक न जाये चाहती । मती-मनुष्यकी ॥ ४३ ॥
ऐसे ही आया अब प्रसंग । ज्ञानमें हमको अति-राग ।
तेरा भी उसीमें अनुराग । इससे यहां ॥ ४४ ॥
इसीलिये यह प्रवचन । खिला है भक्तिसे शत-गुण ।
तभी ज्ञानमें तू है संपूर्ण । कैसे न कहे हम ॥ ४५ ॥
अब यहां इसपर । ज्ञानकी पिछली ओर ।
पद है वह स्पष्ट कर । निरूपणसे ॥ ४६ ॥
४८३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
सुनके संत-वचन ऐसे । कहे निवृत्ति-दास सबसे ।
मेरा भी मनोगत था ऐसे । निरूपणका ॥ ४७ ॥
अब तो यहां हैं आप । आज्ञा देते हैं सकृप ।
व्यर्थका शब्द मैं आप । न करूं यहां ॥ ४८ ॥
जैसे आपने सुना । पार्थसे कृष्णका कहना ।
ज्ञानके लक्षण संपूर्ण । अष्टादश ॥ ४९ ॥
फिर कहते हैं हरि अर्जुन । वह है ज्ञानका वसति-स्थान ।
यह मेरा मत है जो संपूर्ण । ज्ञानी भी यही कहते ॥ ६५० ॥
करतल पर है गोल । फिर रहा जैसे आमला ।
ज्ञान तुझको हे निर्मल । दिखाया मैने ॥ ५१ ॥
अज्ञानके लक्षण-
सुन तू महामति पार्थ । अज्ञान जो है कहलाता ।
वह मैं तुझसे कहता । स-लक्षण ॥ ५२ ॥
जब होता है ज्ञानका भान । जानना सहज है अज्ञान ।
अजी ! जो नहीं होता है ज्ञान । अज्ञान ही रहा ॥ ५३ ॥
दिवस होता है जब समाप्त । रहती है केवल-मात्र रात ।
तीसरा अन्य नहीं होता पार्थ । उसी भांतिसे ॥ ५४ ॥
जहां नहीं होता ज्ञान । वहां देख तू अज्ञान ।
तो भी कहता हूं सुन । लक्षण उसके ॥ ५५ ॥
१ अज्ञानका लक्षण, अभिमान-
मौका देखता स्व-प्रतिष्ठाका । प्रतीक्षा करता सम्मानका ।
होता जब सत्कार उसका । खिलता संतोषसे ॥ ५६ ॥
गर्व-पर्वतके शिखर । बढ़ते जाता महत्व पर ।
उसमें तू पांडुकुमार । अज्ञान जान ॥ ५७ ॥
२ अज्ञानका लक्षण, दंभ-
जैसे स्वधर्मका मंगल । बांधता वाचाका पीपल ।
तथा खडा किया देवल- । में मानो कूंबा ॥ ५८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८४
करता अपने ज्ञानका पसारा । तथा पीटता सु-कृतका ढिंढोरा ।
करता सदा प्रतिष्ठा विचार । बढानेका ॥ ५९ ॥
करता है स्नान देहार्चन । प्राणियोंकी पूजासे वंचन ।
वह आज्ञानकी खान जान । सदैव, पार्थ ॥ ६६० ॥
३ अज्ञानका लक्षण, हिंसा—
होता जब वनमें अग्नि-संचार । जलते हैं तब जंगम-स्थावर ।
वैसे ही होते हैं उनके उपचार । जन दुःखके कारण ॥ ६१ ॥
सहज ही करता जो भाषण । होता है सबरीसे भी तीक्ष्ण ।
विषसे भी करता है मारण । अधिक संकल्प ॥ ६२ ॥
उसका अति अज्ञान । अज्ञानका है निधान ।
तथा हिंसाका सदन । जीवन उसका ॥ ६३ ॥
४ अज्ञानका लक्षण, अशांति—
धौंकनी जब है फूंकती । फूलती और सिकुड़ती ।
संयोग-वियोगमें होती । वैसी स्थिति उसकी ॥ ६४ ॥
जिस भांति बवंडरमें धूल । पहुंचती गगनमें सरल ।
फूलता वह स्तुतिसे बहुल । अपनी पार्थ ॥ ६५ ॥
अल्पांश भी निंदा सुनकर । पकड़कर बैठता शिर ।
सुखाती हवा गळता नीर । कीचडको जैसे ॥ ६६ ॥
मानापमानमें वैसे होता । कोई भी ऊर्मी नहीं सहता ।
जान लेना उसमें तू पार्थ । अज्ञान पूरा ॥ ६७ ॥
५ अज्ञानका लक्षण, कुटिलता—
उसके मनमें होता भिन्न । तथा वाचा बोलती है भिन्न ।
देता किसीको कुछ वचन । सहायता तीसरेको ॥ ६८ ॥
जैसे व्याधका चारा डालना । सरळताका स्वांग रचना ।
सज्जनोंका हृदय जीतना । ऐसे शत्रु-भावसे ॥ ६९ ॥
४८५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
जैसे कायीसे लीपती शिला । अथवा पका निंबौला पीला ।
वैसे दीखता उसका भला । बाह्य-आचार ॥ ६७० ॥
उसमें भरा है अज्ञान । बसता है जान अर्जुन ।
इस बोलसे नहीं भिन्न । दूसरा सत्य ॥ ७१ ॥
६ अज्ञानका लक्षण, गुरुद्रोह--
गुरु-भक्तिमें मानता लांछन । गुरु-सेवामें माने अपमान ।
गुरुसे मिली है विद्या महान । मानता नहीं यह ॥ ७२ ॥
करना उसका नामोच्चरण । चांडालका अन्न खाना ही मान ।
कहनेमें अज्ञानका लक्षण । बोलना पडा मुझे ॥ ७३ ॥
अब गुरु-सेवकका नाम लेगा । जिससे वाचाका प्रायश्चित्त होगा ।
गुरु-भक्तके नामसे दूर होगा । जैसे तम सूर्यसे ॥ ७४ ॥
इससे ही सब पापका । दूर होगा दोष वाचाका ।
जो आया गुरु-निंदाका । नाम लेनेसे ॥ ७५ ॥
गुरु-भक्तका नामोच्चार । उस बातका भय हर ।
अब सुनो चित्त देकर । अन्य लक्षण ॥ ७६ ॥
७ अज्ञानका लक्षण, अशौच--
स्वयं होता है जो कर्म-विरत । मनमें सदा विकल्प भरित ।
रहता कांटे कीचड सहित । वनका कुवास ॥ ७७ ॥
ऊपर झाड झंकाड । अंदर भरे है हाड ।
अशुचिका भरा आड । अंदर बाहर ॥ ७८ ॥
जिस भांति बुभुक्षित कुत्ता । खुला या ढका नहीं जानता ।
अपना पराया न देखता । वैसे द्रव्यार्थ जो ॥ ७९ ॥
इन ग्राम-सिंहमें जैसे । मिलन निषेध ना वैसे ।
स्त्रियोंके विषयमें वैसे । विचार करते नहीं ॥ ६८० ॥
कर्मका समय वे चुकाते । नित्य-नैमित्तिक है टालते ।
इससे वे नहीं पछताते । मनमें कभी ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८६
पापके वे सदा संग । पुण्यमें होते असंग ।
जिनके मनमे वेग । सदा विकल्पके ॥ ८२ ॥
जान तू वह संपूर्ण । अज्ञान है मूर्तिमान ।
मूंदता सदा नयन । वित्ताशासे ॥ ८३ ॥
८ अज्ञानका लक्षण, चांचल्य-
अल्प स्वार्थसे होता चंचल । स्थिरतासे होता है विचल ।
जैसे तृणांकुर जाता ढल । चींटीसे भी ॥ ८४ ॥
पैर भी पडनेसे जैसे । डबरे गंदलाते वैसे ।
भयके नाम सुननेसे । घबडाता जो ॥ ८५ ॥
मनोरथके प्रवाहमें । बहता जाता जो मनमें ।
कुझडा जैसे प्रवाहमें । बहता जाता ॥ ८६ ॥
जैसे है वायुके साथ । धूम्र फैलता दिगंत ।
होती है दुखःकी बात । उसको वैसी ॥ ८७ ॥
जैसे होता बवंडर । होता नहीं कहीं स्थिर ।
तीर्थक्षेत्र और पुर । न करता स्थान ॥ ८८ ॥
जैसे है गिरगिट उन्मत्त । चढने उतरनेमें रत ।
रहता है सदा ही व्यर्थ । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥
जैस बिन पेंदीका जो घडा । बिन गाडे न रहता खडा ।
वैसे नींदमें रहता पडा । नहीं तो भटकता ॥ ६९० ॥
उसमें रहता बहुत । अज्ञान भंडार विस्तृत ।
चांचल्य में लघुभ्रात । मर्कटका जो ॥ ९१॥
९ अज्ञानका लक्षण, स्वैराचार-
और सुन तू धनुर्धर । न छूता उसका अंतर ।
संयमका गंध संस्कार । नाम मात्रको ॥ ९२ ॥
अजी ! जब नालेमें आता पूर । उसे न रोकता बालूका घेरा ।
शास्त्र-निषेधका उसपर । होता नहीं प्रभाव ॥ ९३ ॥
४८७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
करता व्रतोंका अवहेलन । वैसे ही स्वधर्मका उल्लंघन ।
यम-नियम मर्यादा खंडन । करता वह ॥ ९४॥
पापसे वह नहीं उकताता । नहीं उसको पुण्यमें भी आस्था ।
वैसे ही लोक-लाजकी खो देता । सीमा रेखा ॥ ९५ ॥
कुल-धर्म नहीं पहचानता । वेदोंकी आज्ञाको नहीं जानता ।
भला-बुराका ध्यान नहीं देता । कभी वह पार्थ ॥ ९६ ॥
सांडसा वह अनिर्बन्ध । आंधीसा होता अमर्याद ।
टूटा हुवा नदका बांध । निर्जनमें कहीं ॥ ९७ ॥
जैसे अंधा गज मदसे मत्त । या जलता हुआ वन पर्वत ।
वैसे विषयोंमें होता उन्मत्त । चित्त उसका ॥ ९८ ॥
घूरेपर कब कौन क्या न डालते । ग्राम द्वार देहरी कौन न लांघते
राहके सांडको कहो कौन बांधते । पांडुकुमार ॥ ९९ ॥
जैसे अन्न-छत्रमें सभी जाते । या सामान्य अधिकार जताते ।
या सारायीमें कोई घुसते । वैसे ही सदा ॥ ७०० ॥
रहता जिसका अंतःकरण । उसमें होता संचार संपूर्ण ।
अज्ञानमें वहां है निशिदिन । रहती बुद्धि ॥ १ ॥
१० अज्ञानका लक्षण भोगलिप्सा--
विषयोंकी जो है उसकी आस । जीने मरनेमें न होती नास ।
स्वर्गमें भी उसीके आशापाश । ले चलता वह ॥ २ ॥
करता भोगका अखंड जतन । काम्य-क्रियाका है जिसका व्यसन ।
विरक्तका कर मुखावलोकन । करता शबैल ॥ ३ ॥
विषय है उनसे उकताने । ये न उकताने सावध होते ।
सडे हुये हाथोंसे जैसे खाते । महारोगी ॥ ४ ॥
जैसे गर्दभी नहीं आने देती । लातोंसे खरका नाक तोडती ।
फिर भी गर्दभ है सआसक्ति । न लौटना पीछे ॥ ५ ॥
वैसे ही जो विषयोंमें रत । कूदते स्थानमें ज्वाला-ग्रस्त ।
व्यसनमें होकर वे लिप्त । मानते यह भूषण ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८८
यदि मृग टूट भी गिरता । अपनी दौड बढाता जाता ।
किंतु असत्य नहीं मानता । मृगजलका भ्रम ॥ ७ ॥
वैसे जन्मसे मृत्यु पर्यंत । विषयोंमें हो सदैव त्रस्त ।
फिर भी अधिक हो आसक्त । करता मोह ॥ ८ ॥
पहले होती बालदशा । माता पिता इसीकी आशा ।
फिर स्त्री-शरीरका नशा । भुलाता सब ॥ ९ ॥
स्त्री-भोगमें तब काल हरण । होता है वार्धक्यका आगमन ।
तथा बनते अनुराग-स्थान । अपने बालक ॥ ७१० ॥
जन्मांध जैसे अपना घर । नहीं छोड़ता जीवन-भर ।
बच्चोंके विषय तिरस्कार । कभी नहीं होता ॥ ११ ॥
उसमें जान धनुर्धर । अज्ञान रहता अपार ।
सुन अब अन्य प्रकार । अज्ञानके ॥ १२ ॥
११ अज्ञानका लक्षण, देहाभिमान—
यह देह ही है आत्मा । बनाकर मनोधर्म ।
करता रहता कर्म । दिनरात ॥ १३ ॥
कभी कोई कर्माचरण । होता कम अधिक मान ।
तब वह स-अभिमान । फूलता सूखता ॥ १४ ॥
सिरपर देव-मूर्तिके बोझसे । अकडकर चलता पूजारी जैसे ।
विद्या धन वयादि अभिमानसे । अकड चलता वह ॥ १५ ॥
मैं ही हूं महा-धनवान । मेरे घरमें गुण-धन ।
मेरे घरका आचरण । मिलता कहां ? ॥ १६ ॥
कोई नहीं है मेरे समान । मैं ही धन-गुण विद्यावान ।
ऐसे गर्व-तुष्टी मान लीन । हो फिरता वह ॥ १७ ॥
व्याधिग्रस्त मनुष्य जैसे । नहीं सहता भोग वैसे ।
अन्योंकी भलाई उससे । सही नहीं जाती ॥ १८ ॥
४८९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(62)
गुण सारा खाता ही जाता । स्नेह सब जला डालता ।
रखा वहां काला करता । जैसे दीप ॥१९॥
जीवन स्पर्शता तो तडतडता । हवा लगनेसे प्राण ही तजता ।
जहां लगता राख कर रखता । सर्वस्वका ही ॥२०॥
अल्पस्वल्प प्रकाश देता । वैसा ही वह उष्मा देता ।
ऐसे दीपक-भांति होता । वह सुविद्य ॥२१॥
औषध मान दिया भी दूध । नव-ज्वरमें करता बाध ।
पीता है जब वह एकाधा । बनता गरल ॥२२॥
वैसे सद्गुणीका मत्सर । व्युत्पत्तिमें जो अहंकार ।
तप ज्ञानका है अपार । अकड उसको ॥२३॥
बिठाया पंचमको राज्यपर । या निगला खांबको अजगर ।
तब जैसे फूलता स-शरीर । ऐसे वह मानंस ॥२४॥
बेलन जैसे नहीं झुकता । पत्थर जैसे नहीं द्रवता ।
फुरसे जैसे न उतरता । मदारीके मंत्रसे ॥२५॥
ऐसा जो मनुष्य है जान । उसमें बढता अज्ञान ।
यह है निश्चित अर्जुन । कहता हूँ मैं ॥२६॥
१२ अज्ञानका लक्षण, अविचार-
वैसे ही वह पांडुकुमार । नहीं करता कोई विचार ।
गृह-देह-जन्म-मृत्यू पर । अपने कभी ॥२७॥
कृतघ्न पर किया उपकार । या चोरको कर दिया व्यापार ।
या निर्लज्जकी की स्तुति अपार । वे भूलते जैसे ॥२८॥
उठल्लू कुत्तेको जैसे । पूंछ काट भगानेसे ।
फिर वहीं आता वैसे । गीली पूंछ ले ॥२९॥
मेंढक सापके मुखके अंदर । जाता है अपना सर्वस लेकर ।
पकडे रखता मुखमें शिकार । अपनी न सोचता ॥ ७३०॥
ज्ञानेश्वरी ४९०
वैसे हैं स्रवते नव-द्वार । त्वचा-रोगसे गला शरीर ।
चितमें उसका जो विचार । नहीं करता ॥ ३१ ॥
माताके उदर गह्वरमें । पचके मलके गर्तमें ।
नव माह तक जठरमें । ऊबा था जो ॥ ३२ ॥
गर्भकी थी जो वह व्यथा । जन्मके बाद वही कथा ।
यह सब ही है सर्वथा । भूलके बैठा ॥ ३३ ॥
मल मूत्र लिप्त बालक । गोदमें देख स-कौतुक ।
न घिनता सोचके शोक । करता अपना ॥ ३४ ॥
कलका जन्म जो गया । आजका भी जन्म आया ।
सोच नहीं आया गया । इसका कभी ॥ ३५ ॥
वैसे ही सुन तू अर्जुन । तारुण्यका कर दर्शन ।
न सोचता उसका मन । मृत्युकी बात ॥ ३६ ॥
जीवनका अति विश्वास । मृत्युके अस्तित्वका भास ।
सदैव उसका मानस । भूलता जाता ॥ ३७ ॥
होते हैं डबरेके मीन जैसे । यह नहीं सूखेगा मान ऐसे ।
उसीमें पडे रहते हैं वैसे । न जाते गहरेमें ॥ ३८ ॥
सुनकर किरातका गान । मृग करते व्याध-दर्शन ।
आमिष लोभसे जैसे मीन । निगलता कांटा ॥ ३९ ॥
जैसे देख ज्योतिका जगमग । जला लेता अपनेको पतंग ।
नहीं जानता है जलेगा अंग । मोहमें वैसे ॥ ७४० ॥
निद्रा-सुखमें जैसे गंवार । नहीं देखता जलता घर ।
नहीं जान अन्नमें जहर । खाता अज्ञ ॥ ४१ ॥
वैसे जीवनका रूप लेकर । आयी मृत्यू यह न जानकर ।
पडता विषय-सुख भंवर । मस्त हो क्षणिक ॥ ४२ ॥
दिन-रात जो खपता । शरीरको है बढाता ।
सुख वैभव मानता । विषयका सत्य ॥ ४३ ॥
४९१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
बेचारा यह न जानता । बेश्याकी सर्वस्व-दातृता ।
वही सही कारण होता । सर्व-नाशका ॥ ४४ ॥
मित्रता चोरके साथ । प्राण लेती है निश्चित ।
धोना चित्रको सतत । उसीमें नाश ॥ ४५ ॥
पांडु-रोगीकी देह फूलना । जैसे उसका नाम मिटना ।
वैसे किसीका है भूलना । आहार-निद्रा ॥ ४६ ॥
सम्मुख देखकर शूल । चलता जो पैरसे चपल ।
प्रति पगमें मृत्यु निश्चल । लाना पास ॥ ४७ ॥
जैसे देह बढती जाती । वैसे आयु घटती जाती ।
औ' विषय-भोगकी होती । समृद्धि नित्य ॥ ४८ ॥
तथा आती है अधिकाधिक । मृत्यु जीवनके नजदीक ।
जैसे मिटते जाता नमक । पानीसे सतत ॥ ४९ ॥
ऐसे जीवन गलता जाता । मरण नित समीप आता ।
इस बातको जो न देखता । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७५० ॥
अथवा जान तू अर्जुन । मृत्यूसे लीपा यह तन ।
न होता उसका दर्शन । विषय-भ्रांतिसे ॥ ५१ ॥
अज्ञान देशका भूप । जान तू उसको आप ।
यह अपनेमें आप । निश्चित बात ॥ ५२ ॥
१३ अज्ञानका लक्षण, वृद्धावस्थासे अनजान --
जीवनके संतोषसे जैसे । नहीं देखता है मृत्यू वैसे ।
तरुणायीके नशामें उसे । न दीखाता वार्धक्य ॥ ५३ ॥
गाडी कगारसे फिसली हुयी । शिला-शिखरसे जो छूटी हुयी ।
आगे न देखते गढा या खायी । वैसे वह वार्धक्य ॥ ५४ ॥
वनके नालेमें पानी चढा । या भैंसेसे जाके भैंसा भिडा ।
वैसे तारुण्यका नशा चढा । जिसको उसे ॥ ५५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४९२
पुष्टि बिगडती । कांति उतरती ।
मान भी कांपती । अस्थिरतासे ॥ ५६ ॥
बाल सब पकते । अंगांग भी कांपते ।
तो भी फंसे रहते । माया-जालमें ॥ ५७ ॥
सामनेका जब नहीं टकराता । तब तक अंधा कुछ न जानता ।
अथवा आंखोंके नशा पर होता । आलसी संतुष्ट ॥ ५८ ॥
भोगता वैसे ही आजका यौवन । तो आ पहुंचता वार्धक्य दारुण ।
नहीं देखता इसको जो अज्ञान । कहलाता पार्थ ॥ ५९ ॥
दुबला कुबडा देखकर । चिढाता है अकडकर ।
कल होगा अपना शरीर । ऐसा यह न जानता ॥ ७६० ॥
शरीरमें वार्धक्य दीखता । जो है मृत्यूका संदेश देता ।
किंतु वह भ्रममें रहता । अपने तारुण्यके ॥ ६१ ॥
वह है अज्ञानका आगार । और भी सुन लक्ष देकर ।
और भी लक्षण धनुर्धर । कहता हूं मैं ॥ ६२ ॥
१४ अज्ञानका लक्षण, रोगसे असावधान—
जैसे कभी व्याघ्र वनसे । चरके लौटा जो दैवसे ।
फिर जाता है ढिटायीसे । जैसे सांड ॥ ६३ ॥
अथवा घरसे सांपके । द्रव्य अचानक उठाके ।
लाता जो मानता सांपके । नहीं होते दांत ॥ ६४ ॥
वैसे ही कभी अकस्मात । होता है एक दो घटित ।
मानता है वह निश्चित । नहीं है रोग ॥ ६५ ॥
देखकर जो शत्रू सोया । मानता वैर मिट गया ।
उसने सर्वस्व ही खोया । अपना जैसे ॥ ६६ ॥
वैसे आहार निद्राका व्यवस्थित । चलते हैं व्यवहार नियमित ।
तब तक है व्याधिसे निश्चित । रहता जो ॥ ६७ ॥
४९३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
तथा स्त्री-पुत्रके साथ । भोगता है संपदा पार्थ ।
रजसे होता है उन्मत्त । विषयोंमें जो ॥ ६८ ॥
इसके साथ वियोग भी होगा । वैसे ही कोयी संकट आयेगा ।
इस भांति वह नहीं देखेगा । विचारसे ॥ ६९ ॥
उसीको अज्ञानी जान । तथा वही अर्जुन ।
देता है यथेच्छ अन्न । इंद्रियोंको ॥ ७० ॥
तारुण्य मदमें न देखता । संपत्तिके साथ ही बहता ।
सेव्य असेव्य नहीं मानता । ऐसा कभी ॥ ७१ ॥
करना नहीं वही करता । असंभाव्य मनमें धरता ।
अ-सोचका चिंतन करता । जिसका मन ॥ ७२ ॥
नहीं घुसना वहीं घुसता । जो न चाहना वही मांगता ।
नहीं छूना उसीसे मिलता । जिसका मन अंग ॥ ७३ ॥
नहीं जाना वहीं है जाता । न देखना वह देखता ।
नहीं खाना वही खाता । संतोषसे जो ॥ ७४ ॥
न करना उसका संग । नहीं भोगना वही भोग ।
नहीं चलना वही मार्ग । चलता वह ॥ ७५ ॥
नहीं सुनना वही सुनता । नहीं बोलना वही बकता ।
इतने पर भी न देखता । इसमें दोष ॥ ७६ ॥
तन-मनको जो रुचता । कृत्य-अकृत्य न देखता ।
कर्तव्य मानके करता । असंगत सारा ॥ ७७ ॥
इससे पाप भी होगा । नरक-क्लेश भी होगा ।
यह कुछ न देखेगा । भविष्यका जो ॥ ७८ ॥
इसके संगतिसे अज्ञान । होता है इतना बलवान ।
ज्ञानसे जो उतरता जान । संघर्ष रत हो ॥ ७९ ॥
रहने दो अब यह अर्जुन । दिखाता हूं अज्ञान मूर्तिमान ।
इससे मानेगा तू वह पूर्ण । सही रूपसे ॥ ७८० ॥
ज्ञानेश्वरी ४९४
१५ अज्ञानका लक्षण, सदा विषय-सेवन—
अनुराग जिसका संपूर्ण । उलझा हुवा घरमें जान ।
जिस भांति भ्रमर अर्जुन । नवगंध केसरमें ॥ ८१ ॥
देख जैसा शर्कराका ढेर । न उठे मक्षिका बैठकर ।
वैसे रमणीमें रमकर । न उठे चित्त ॥ ८२ ॥
जैसे पानीमें मेंढक । तथा श्लेष्ममें मशक ।
कीचड़में फंसा देख । चौपाये जैसे ॥ ८३ ॥
वैसे घरसे कभी निकलना । नहीं करता जीव मन प्राण ।
जैसे सांप बेंबीमें दे आसन । बैठा ही रहता ॥ ८४ ॥
जैसे प्रमदा बन कंठहार । पकड बैठती है प्रियकर ।
वैसे अपनी कुटियाका द्वार । पकड बैठता यह ॥ ८५ ॥
मधुर रसके उद्देश्यसे । खपता है मधुकर जैसे ।
गृह-संगोपनमें भी वैसे । रहता है यह ॥ ८६ ॥
जब बुढापेमें है होता । दैवसे पुत्र इकलौता ।
उससे जैसे प्रेम होता । माता-पिताका ॥ ८७ ॥
उसी प्रेमसे होती पार्था । घरमें उसकी जो आस्था ।
बिना स्त्रीके वह सर्वथा । न जाने कुछ ॥ ८८ ॥
जैसे स्त्री-देहमें वह जीव । भजता रहता सर्व-भाव ।
कौन मैं कर्तव्य क्या स्वभाव । भूलता है ॥ ८९ ॥
महा पुरुषका जो चित्त । बनके ऐसा वस्तुगत ।
भूलता व्यवहार-जात । उसी भांति ॥ ८९० ॥
हानि लाज नहीं देखता । परापवाद नहीं सुनता ।
सर्वेंद्रियोंसे जो रमता । स्त्रीमें एकाग्र हो ॥ ९१ ॥
चित्त करता है स्त्री-आराधन । तथा उसकी धुनमें नर्तन ।
जैसे मर्कट हो आज्ञाधीन । मदारीके जैसे ॥ ९२ ॥
४९५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग