ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबेचारा यह न जानता । बेश्याकी सर्वस्व-दातृता ।
वही सही कारण होता । सर्व-नाशका ॥ ४४ ॥
मित्रता चोरके साथ । प्राण लेती है निश्चित ।
धोना चित्रको सतत । उसीमें नाश ॥ ४५ ॥
पांडु-रोगीकी देह फूलना । जैसे उसका नाम मिटना ।
वैसे किसीका है भूलना । आहार-निद्रा ॥ ४६ ॥
सम्मुख देखकर शूल । चलता जो पैरसे चपल ।
प्रति पगमें मृत्यु निश्चल । लाना पास ॥ ४७ ॥
जैसे देह बढती जाती । वैसे आयु घटती जाती ।
औ' विषय-भोगकी होती । समृद्धि नित्य ॥ ४८ ॥
तथा आती है अधिकाधिक । मृत्यु जीवनके नजदीक ।
जैसे मिटते जाता नमक । पानीसे सतत ॥ ४९ ॥
ऐसे जीवन गलता जाता । मरण नित समीप आता ।
इस बातको जो न देखता । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७५० ॥
अथवा जान तू अर्जुन । मृत्यूसे लीपा यह तन ।
न होता उसका दर्शन । विषय-भ्रांतिसे ॥ ५१ ॥
अज्ञान देशका भूप । जान तू उसको आप ।
यह अपनेमें आप । निश्चित बात ॥ ५२ ॥
१३ अज्ञानका लक्षण, वृद्धावस्थासे अनजान --
जीवनके संतोषसे जैसे । नहीं देखता है मृत्यू वैसे ।
तरुणायीके नशामें उसे । न दीखाता वार्धक्य ॥ ५३ ॥
गाडी कगारसे फिसली हुयी । शिला-शिखरसे जो छूटी हुयी ।
आगे न देखते गढा या खायी । वैसे वह वार्धक्य ॥ ५४ ॥
वनके नालेमें पानी चढा । या भैंसेसे जाके भैंसा भिडा ।
वैसे तारुण्यका नशा चढा । जिसको उसे ॥ ५५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४९२