ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे हैं स्रवते नव-द्वार । त्वचा-रोगसे गला शरीर ।
चितमें उसका जो विचार । नहीं करता ॥ ३१ ॥
माताके उदर गह्वरमें । पचके मलके गर्तमें ।
नव माह तक जठरमें । ऊबा था जो ॥ ३२ ॥
गर्भकी थी जो वह व्यथा । जन्मके बाद वही कथा ।
यह सब ही है सर्वथा । भूलके बैठा ॥ ३३ ॥
मल मूत्र लिप्त बालक । गोदमें देख स-कौतुक ।
न घिनता सोचके शोक । करता अपना ॥ ३४ ॥
कलका जन्म जो गया । आजका भी जन्म आया ।
सोच नहीं आया गया । इसका कभी ॥ ३५ ॥
वैसे ही सुन तू अर्जुन । तारुण्यका कर दर्शन ।
न सोचता उसका मन । मृत्युकी बात ॥ ३६ ॥
जीवनका अति विश्वास । मृत्युके अस्तित्वका भास ।
सदैव उसका मानस । भूलता जाता ॥ ३७ ॥
होते हैं डबरेके मीन जैसे । यह नहीं सूखेगा मान ऐसे ।
उसीमें पडे रहते हैं वैसे । न जाते गहरेमें ॥ ३८ ॥
सुनकर किरातका गान । मृग करते व्याध-दर्शन ।
आमिष लोभसे जैसे मीन । निगलता कांटा ॥ ३९ ॥
जैसे देख ज्योतिका जगमग । जला लेता अपनेको पतंग ।
नहीं जानता है जलेगा अंग । मोहमें वैसे ॥ ७४० ॥
निद्रा-सुखमें जैसे गंवार । नहीं देखता जलता घर ।
नहीं जान अन्नमें जहर । खाता अज्ञ ॥ ४१ ॥
वैसे जीवनका रूप लेकर । आयी मृत्यू यह न जानकर ।
पडता विषय-सुख भंवर । मस्त हो क्षणिक ॥ ४२ ॥
दिन-रात जो खपता । शरीरको है बढाता ।
सुख वैभव मानता । विषयका सत्य ॥ ४३ ॥
४९१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग