ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 562, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुण सारा खाता ही जाता । स्नेह सब जला डालता ।
रखा वहां काला करता । जैसे दीप ॥१९॥
जीवन स्पर्शता तो तडतडता । हवा लगनेसे प्राण ही तजता ।
जहां लगता राख कर रखता । सर्वस्वका ही ॥२०॥
अल्पस्वल्प प्रकाश देता । वैसा ही वह उष्मा देता ।
ऐसे दीपक-भांति होता । वह सुविद्य ॥२१॥
औषध मान दिया भी दूध । नव-ज्वरमें करता बाध ।
पीता है जब वह एकाधा । बनता गरल ॥२२॥
वैसे सद्गुणीका मत्सर । व्युत्पत्तिमें जो अहंकार ।
तप ज्ञानका है अपार । अकड उसको ॥२३॥
बिठाया पंचमको राज्यपर । या निगला खांबको अजगर ।
तब जैसे फूलता स-शरीर । ऐसे वह मानंस ॥२४॥
बेलन जैसे नहीं झुकता । पत्थर जैसे नहीं द्रवता ।
फुरसे जैसे न उतरता । मदारीके मंत्रसे ॥२५॥
ऐसा जो मनुष्य है जान । उसमें बढता अज्ञान ।
यह है निश्चित अर्जुन । कहता हूँ मैं ॥२६॥
१२ अज्ञानका लक्षण, अविचार-
वैसे ही वह पांडुकुमार । नहीं करता कोई विचार ।
गृह-देह-जन्म-मृत्यू पर । अपने कभी ॥२७॥
कृतघ्न पर किया उपकार । या चोरको कर दिया व्यापार ।
या निर्लज्जकी की स्तुति अपार । वे भूलते जैसे ॥२८॥
उठल्लू कुत्तेको जैसे । पूंछ काट भगानेसे ।
फिर वहीं आता वैसे । गीली पूंछ ले ॥२९॥
मेंढक सापके मुखके अंदर । जाता है अपना सर्वस लेकर ।
पकडे रखता मुखमें शिकार । अपनी न सोचता ॥ ७३०॥
ज्ञानेश्वरी ४९०