सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 548, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 548

न छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर ।
तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥
कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर ।
होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥
जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य ।
वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥
लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध ।
जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥
जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर ।
वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥
ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे ।
होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥
भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे ।
गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥
गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता ।
उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥
रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें ।
वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥
तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर ।
बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥
उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल ।
दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥
अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक ।
वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥
जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके ।
वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७६