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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 560

करता व्रतोंका अवहेलन । वैसे ही स्वधर्मका उल्लंघन ।
यम-नियम मर्यादा खंडन । करता वह ॥ ९४॥
पापसे वह नहीं उकताता । नहीं उसको पुण्यमें भी आस्था ।
वैसे ही लोक-लाजकी खो देता । सीमा रेखा ॥ ९५ ॥
कुल-धर्म नहीं पहचानता । वेदोंकी आज्ञाको नहीं जानता ।
भला-बुराका ध्यान नहीं देता । कभी वह पार्थ ॥ ९६ ॥
सांडसा वह अनिर्बन्ध । आंधीसा होता अमर्याद ।
टूटा हुवा नदका बांध । निर्जनमें कहीं ॥ ९७ ॥
जैसे अंधा गज मदसे मत्त । या जलता हुआ वन पर्वत ।
वैसे विषयोंमें होता उन्मत्त । चित्त उसका ॥ ९८ ॥
घूरेपर कब कौन क्या न डालते । ग्राम द्वार देहरी कौन न लांघते
राहके सांडको कहो कौन बांधते । पांडुकुमार ॥ ९९ ॥
जैसे अन्न-छत्रमें सभी जाते । या सामान्य अधिकार जताते ।
या सारायीमें कोई घुसते । वैसे ही सदा ॥ ७०० ॥
रहता जिसका अंतःकरण । उसमें होता संचार संपूर्ण ।
अज्ञानमें वहां है निशिदिन । रहती बुद्धि ॥ १ ॥
१० अज्ञानका लक्षण भोगलिप्सा--
विषयोंकी जो है उसकी आस । जीने मरनेमें न होती नास ।
स्वर्गमें भी उसीके आशापाश । ले चलता वह ॥ २ ॥
करता भोगका अखंड जतन । काम्य-क्रियाका है जिसका व्यसन ।
विरक्तका कर मुखावलोकन । करता शबैल ॥ ३ ॥
विषय है उनसे उकताने । ये न उकताने सावध होते ।
सडे हुये हाथोंसे जैसे खाते । महारोगी ॥ ४ ॥
जैसे गर्दभी नहीं आने देती । लातोंसे खरका नाक तोडती ।
फिर भी गर्दभ है सआसक्ति । न लौटना पीछे ॥ ५ ॥
वैसे ही जो विषयोंमें रत । कूदते स्थानमें ज्वाला-ग्रस्त ।
व्यसनमें होकर वे लिप्त । मानते यह भूषण ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८८