सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 553, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 553

शैल-कक्षाके गह्वर । जलाशय परिसर ।
किंतु न चाहे शहर । रहनेके लिये ॥ १२ ॥
एकांत पर उसकी प्रीति । जन-संगमें है अ-प्रवृति ।
जान तू मनुष्याकार-मूर्ति । ज्ञानकी वह ॥ १३ ॥
कहता ज्ञानके लक्षण । और भी मैं तुझे अर्जुन ।
तू है अत्यंत बुद्धिमान । सुनो इसे ॥ १४ ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥ ११ ॥
१७-१८ ज्ञानका लक्षण, अध्यात्म-ज्ञान, ज्ञेय-दर्शन--
अजी ! परमात्म ऐसे । वस्तु होती है जिससे ।
दर्शन होता है उसे । कहते हैं ज्ञान ॥ १५ ॥
इस एक ज्ञानके बिन । स्वर्ग-दायक आदि ज्ञान ।
मानना है वह अज्ञान । निश्चय-पूर्वक ॥ १६ ॥
स्वर्गकी बात वह छोडता । संसारसे नाता ही छोडता ।
अध्यात्म-ज्ञानमें डूब जाता । सद्भावकासे ॥ १७ ॥
पथिक जैसे चौराहे पर । दूसरे पथोंको तज कर ।
चलता अपने पथ पर । वैसे ही वह ॥ १८ ॥
कर ज्ञान मात्रका निरीक्षण । दूसरे सबका निराकरण ।
स्वीकार करता केवल आत्म-ज्ञान । अपने मन-बुद्धिसे ॥ १९ ॥
कहता है सही यह एक । अन्य सभी है भ्रांति-मूलक ।
ऐसी मति कर स्थिर देख । रहता मेरु-सा ॥ ६२० ॥
ऐसा निश्चय जिसका । आत्म-ज्ञान विषयका ।
ध्रुव जैसा गगनका । वैसा रहता ॥ २१ ॥
अध्यात्म-ज्ञानमें श्रध्दा तत्वत' ज्ञेय-दर्शन ।
कहा है इसको ज्ञान अज्ञान विपरीत जो ॥ ११ ॥
४८१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(61)