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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 555

हमें यह तेरा मधुर । वक्तृत्वका पाहुनाचार ।
ज्ञानका कराया साकार । शब्द-दर्शन ॥ ३४ ॥
रस होना है अति मात्र । लिया है तूने कवि मंत्र ।
बुलाके हमें यह तंत्र । करता क्यों शत्रुताका ॥ ३५ ॥
प्रेमसे भोजनमें बुलाया । सजाके पंगतमें बिठाया ।
और सभी पकवान्न भगाया । इससे मिला क्या ॥ ३६ ॥
गाय है सुंदर पुष्ट बछडा साथ । काह्यमें हाथ लगाते मारती लाथ ।
कौन पालेगा कहो उसे समर्थ । व्यर्थ ही घरमें ॥ ३७ ॥
वैसे ज्ञानमें मति नहीं प्रकाशती । जल्पोंमें व्यर्थ स-कौतुक दौडती ।
वैसे तूने अन्य कवि-गणकी भांति । तिहीं किया निरूपण ॥ ३८ ॥
पानेके लिये जो कुछ ज्ञानांश । करता योग-यागादि सायास ।
उस ज्ञानका तूने किया स-उल्हास । योग्य-निरूपण ॥ ३९ ॥
अमृत मिला जैसे सतत । इससे ऊबेगा कोई तात ।
या सुखके दिनका गणित । करेगा क्या कोई ॥ ४० ॥
या पूर्ण चंद्रकी रात । आयेगी युग-पर्यंत ।
कहेगा उसे क्या व्यर्थ । कभी चकोर ॥ ४१ ॥
वैसे हैं ज्ञानके बोल । वह भी ऐसे रसाल ।
कौन कहेगा अकुशल । हुवा बहु ॥ ४२ ॥
आता जब भाग्यशाली अतिथि । परोसती गृहिणी दैववती ।
रसौयी चुक न जाये चाहती । मती-मनुष्यकी ॥ ४३ ॥
ऐसे ही आया अब प्रसंग । ज्ञानमें हमको अति-राग ।
तेरा भी उसीमें अनुराग । इससे यहां ॥ ४४ ॥
इसीलिये यह प्रवचन । खिला है भक्तिसे शत-गुण ।
तभी ज्ञानमें तू है संपूर्ण । कैसे न कहे हम ॥ ४५ ॥
अब यहां इसपर । ज्ञानकी पिछली ओर ।
पद है वह स्पष्ट कर । निरूपणसे ॥ ४६ ॥
४८३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग