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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 549

तथा झडीसे आषाढ़की । झरनी खाई पहाड़की ।
वैसे मुखसे लारकी । बहेगी धार ॥ ६७ ॥
बोल तुतला घिघियायेंगे । कान तुतुने बधिरायेंगे ।
पिंड जकड कुम्हलायेगा । मानो बानर-सा ॥ ६८ ॥
खेतोंमें हौवा जैसे घासका । कांपता खाके झोंका हवाका ।
वैसे हाल होगा सर्वांग शरीरका । उस समय ॥ ६९ ॥
पैरमें पैर अटकेंगे । हाथ कांप सकुचायेंगे ।
शरीर-कर्म उपहासेंगे । अपने आपको ॥ ७० ॥
होंगे मलमूत्रादिके द्वार । जैसे टूटे घडेके खापर ।
और मेरे निधनमें इतर । करेंगे मनौतियां ॥ ७१ ॥
यह देखके कोसेगा जग । होगा तब मृत्युका वियोग ।
आप्त-जन करेंगे उबग । तब मेरा ॥ ७२ ॥
स्त्रियां कहेंगी मुझको भूत । सुन होंगे बालक मूर्छित ।
इससे बनूंगा मैं सतत । घृणा-पात्र ॥ ७३ ॥
रातमें खांसीका उबाल । सोये हुये सुन सकल ।
“कितनोंको खायेगा काल” । कहेंगे “न जाने यह” ॥ ७४ ॥
वार्धक्यका ऐसा विज्ञापन । देख होता वह सावधान ।
तारुण्यमें ही उसका मन । होता उपशम ॥ ७५ ॥
कहता यह कल आयेगा । आजका भोगमें बीतेगा ।
आत्म-हितमें क्या रहेगा । अपने पास ॥ ७६ ॥
आनेसे पहले बधिरता । सुनने-योग्य सब सुनता ।
जब तक पंगु नहीं होता । करता देशाटन ॥ ७७ ॥
जब तक दृष्टि रहती । देखने योग्य देख लेती ।
जब तक वाचा रहती । गाता मंगल-गान ॥ ७८ ॥
हाथ होंगे ये तब बधिर । जान करता अब अधीर ।
सत्कर्मको वह निरंतर । दानादिक ॥ ७९ ॥
४७७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग