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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 550

ऐसा होगा तब सकल । मन होगा जान पागल ।
ध्यान-मग्न होता निश्चल । आत्म-ज्ञानमें ॥ ५८० ॥
चोर आयेंगे दिनमें जो जानता । तभी संपत्तीकी व्यवस्था करता ।
दीप बुझनेसे पहले लगाता । वस्तु सुचारु रूपसे ॥ ८१ ॥
वैसे वार्धक्य कल आयेगा । यह सब ही व्यर्थ जायेगा ।
तारुण्यमें ही कर रखेगा । सभी व्यवस्था ॥ ८२ ॥
अति दुर्गम-पथ यह जान । संध्याकाल कर अवलोकन ।
आप मात्र निकला जो अर्जुन । क्या करेंगे चोर ॥ ८३ ॥
ऐसी जराकी आहट पाकर । जो व्यर्थ न हो यह जानकर ।
बैठा है शत-वृद्ध बनकर । उसको डरना क्या ? ॥ ८४ ॥
फटकी बालोंको फटकना । उससे न निकलना दाना ।
या राखको ही फिर जलाना । इससे होगा क्या ? ॥ ८५ ॥
करके वार्धक्यका विचार । किया उसका प्रभाव दूर ।
उसके पास ज्ञान अपार । रहता सदैव ॥ ८६ ॥
वैसे ही नहीं जब अनेक रोग । जिसके नहीं व्यापते सभी अंग ।
तभी वह आरोग्यका उपयोग । करता सदैव ॥ ८७ ॥
अजी ! सांपके मुखसे । गिरा हुवा कौर जैसे ।
तज देता सदा वैसे । बुध्दिमान ॥ ८८ ॥
जिसके वियोगसे दुःख । बढ़ते विपत्ति औ' शोक ।
तजके वैसे स्नेह-सुख । रहता उदासीन ॥ ८९ ॥
अजी ! दोष स्पर्शेंगे कैसे । न करता कर्म जो वैसे ।
नियमित कर्मेंद्रियोंसे । रोकके रहता ॥ ५९० ॥
ऐसे अनेक युक्तिसे । रहता है दक्षतासे ।
ज्ञान-संपत्तिका उसे । मानो स्वामी ॥ ९१ ॥
अब और ही एक । लक्षण अलौकिक ।
कहता सुन नेक । धनंजय ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७८