ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे कायीसे लीपती शिला । अथवा पका निंबौला पीला ।
वैसे दीखता उसका भला । बाह्य-आचार ॥ ६७० ॥
उसमें भरा है अज्ञान । बसता है जान अर्जुन ।
इस बोलसे नहीं भिन्न । दूसरा सत्य ॥ ७१ ॥
६ अज्ञानका लक्षण, गुरुद्रोह--
गुरु-भक्तिमें मानता लांछन । गुरु-सेवामें माने अपमान ।
गुरुसे मिली है विद्या महान । मानता नहीं यह ॥ ७२ ॥
करना उसका नामोच्चरण । चांडालका अन्न खाना ही मान ।
कहनेमें अज्ञानका लक्षण । बोलना पडा मुझे ॥ ७३ ॥
अब गुरु-सेवकका नाम लेगा । जिससे वाचाका प्रायश्चित्त होगा ।
गुरु-भक्तके नामसे दूर होगा । जैसे तम सूर्यसे ॥ ७४ ॥
इससे ही सब पापका । दूर होगा दोष वाचाका ।
जो आया गुरु-निंदाका । नाम लेनेसे ॥ ७५ ॥
गुरु-भक्तका नामोच्चार । उस बातका भय हर ।
अब सुनो चित्त देकर । अन्य लक्षण ॥ ७६ ॥
७ अज्ञानका लक्षण, अशौच--
स्वयं होता है जो कर्म-विरत । मनमें सदा विकल्प भरित ।
रहता कांटे कीचड सहित । वनका कुवास ॥ ७७ ॥
ऊपर झाड झंकाड । अंदर भरे है हाड ।
अशुचिका भरा आड । अंदर बाहर ॥ ७८ ॥
जिस भांति बुभुक्षित कुत्ता । खुला या ढका नहीं जानता ।
अपना पराया न देखता । वैसे द्रव्यार्थ जो ॥ ७९ ॥
इन ग्राम-सिंहमें जैसे । मिलन निषेध ना वैसे ।
स्त्रियोंके विषयमें वैसे । विचार करते नहीं ॥ ६८० ॥
कर्मका समय वे चुकाते । नित्य-नैमित्तिक है टालते ।
इससे वे नहीं पछताते । मनमें कभी ॥ ८१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४८६