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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 557

करता अपने ज्ञानका पसारा । तथा पीटता सु-कृतका ढिंढोरा ।
करता सदा प्रतिष्ठा विचार । बढानेका ॥ ५९ ॥
करता है स्नान देहार्चन । प्राणियोंकी पूजासे वंचन ।
वह आज्ञानकी खान जान । सदैव, पार्थ ॥ ६६० ॥
३ अज्ञानका लक्षण, हिंसा—
होता जब वनमें अग्नि-संचार । जलते हैं तब जंगम-स्थावर ।
वैसे ही होते हैं उनके उपचार । जन दुःखके कारण ॥ ६१ ॥
सहज ही करता जो भाषण । होता है सबरीसे भी तीक्ष्ण ।
विषसे भी करता है मारण । अधिक संकल्प ॥ ६२ ॥
उसका अति अज्ञान । अज्ञानका है निधान ।
तथा हिंसाका सदन । जीवन उसका ॥ ६३ ॥
४ अज्ञानका लक्षण, अशांति—
धौंकनी जब है फूंकती । फूलती और सिकुड़ती ।
संयोग-वियोगमें होती । वैसी स्थिति उसकी ॥ ६४ ॥
जिस भांति बवंडरमें धूल । पहुंचती गगनमें सरल ।
फूलता वह स्तुतिसे बहुल । अपनी पार्थ ॥ ६५ ॥
अल्पांश भी निंदा सुनकर । पकड़कर बैठता शिर ।
सुखाती हवा गळता नीर । कीचडको जैसे ॥ ६६ ॥
मानापमानमें वैसे होता । कोई भी ऊर्मी नहीं सहता ।
जान लेना उसमें तू पार्थ । अज्ञान पूरा ॥ ६७ ॥
५ अज्ञानका लक्षण, कुटिलता—
उसके मनमें होता भिन्न । तथा वाचा बोलती है भिन्न ।
देता किसीको कुछ वचन । सहायता तीसरेको ॥ ६८ ॥
जैसे व्याधका चारा डालना । सरळताका स्वांग रचना ।
सज्जनोंका हृदय जीतना । ऐसे शत्रु-भावसे ॥ ६९ ॥
४८५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग