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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

सामान्य और विशेष एक । मिलाया हुवा जो आप देख ।
उसको कानसे मुख तक । न ले जायेंगे ॥ २२ ॥
ग्रसता संदेहका खल-मल । जब शुध्द-प्रमेय जो निर्मल ।
पैरोंकी स्फूर्ति आती उसी पल । पीछे भागनेकी ॥ २३ ॥
अजी ! जल-कुंभीसे । ढके हुए नीरसे ।
कभी न करे जैसे । क्रीडा हंस ॥ २४ ॥
चांदनी जो बादल पारसे । उसको नहीं देखता जैसे ।
आंख उठाकर कौतुकसे । चकोर पक्षी कभी ॥ २५ ॥
वैसे आप नहीं लेंगे पास । इस ग्रंथको इच्छासे खास ।
करेंगे सक्रोध उपहास । सा-शंक निरूपणपे ॥ २६ ॥
न कर संदेह निवारण । किया हो तो मैंने निरूपण ।
उससे कभी आपका मन । मिलेगा क्या मुझको ? ॥ २७ ॥
तथा मेरा जो यह् संपूर्ण । कहनेका है सब कारण ।
आपका प्रसाद प्रति-क्षण । सदा सन्मुख हो ॥ २८ ॥
गीतार्थ आपको प्रिय मान । गीताको किया आश्रय-स्थान ।
तथा मान मैं प्राण-समान । बोलता हूं आपसे ॥ २९ ॥
आप अपना जो सर्वस्व देंगे । अपना स्वत्व यह् छुडालेंगे ।
ग्रंथ नहीं यह् बंधक मानेंगे । सर्व-भावसे ॥ ३३० ॥
अपने सर्वस्वका लोभ धरेंगे । या बंधकका अनादर करेंगे ।
गीता तथा मेरी भी आप मानेंगे । एक ही गति ॥ ३१ ॥
चाहता हूं मैं केवल । कृपा आपकी निर्मल ।
इसीलिये मैं ये बोल । बोलता हूं ॥ ३२ ॥
बैठे हैं आप रसिक जन । आपके योग्य देना व्याख्यान ।
तभी मतांतरका कथन । किया सब ॥ ३३ ॥
इससे कथा-विस्तार भया । श्लोकार्थसे कुछ दूर गया ।
सो मैंने क्षमायाचन किया । आपत्य-भावसे ॥ ३४ ॥
४५७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(58)

अजी ! कौरमें जब कंकड आता । उसको दूर करना ही पडता ।
उसे निकालनेमें समय जाता । दूषण है क्या यह ? ॥ ३५ ॥
बालक जब चोरसे बचकर । आता है अपने घर कर देर ।
माता नहीं बोलती डांट कर । प्रसन्न हो कहती आया ! ॥ ३६ ॥
किंतु यह बात ऐसी नहीं है । आपने सहा जो भला किया है।
भगवानने जो आगे कहा है । वह सुनिये अब ॥ ३७ ॥
कहता उन्मेख सुलोचन । सावध हो तू अर्जुन ।
कहूंगा अब तुझे ज्ञान । परिपूर्ण जो ॥ ३८ ॥
४ ज्ञानका लक्षण, शांति-
बिन आक्रोश जहां । क्षमा होती है कहां ।
ज्ञान होता है वहां । जान निश्चित ॥ ३९ ॥
गहरे सरोवरमें जैसे । कमलिनी बढती है वैसे ।
या सुदैवीके घरमें जैसे । बढती संपत्ति ॥ ३४० ॥
उसी भांतिसे हे पार्थ । बढती क्षमा यथार्थ ।
उसके लक्षण सार्थ । कहते अब ॥ ४१ ॥
जैसे प्रिय-भूषण । करते हैं धारण ।
वैसे है जो सहन । करता सर्व ॥ ४२ ॥
त्रिविध तापोंका संपूर्ण । हुवा उनपे आक्रमण ।
तो भी उसका चित्त जान । नहीं होता चंचल ॥ ४३ ॥
अपेक्षित पाके मन । होता है जैसे प्रसन्न ।
अनपेक्षितका जान । वही आदर ॥ ४४ ॥
मानापमानको जो सहता । सुख दुःखको है समा लेता ।
निंदा-स्तुतिको भी मानता । एक समान ॥ ४५ ॥
उष्मासे जो न तपता । शीतसे जो न कांपता ।
न किसीसे है डरता । किसी समय ॥ ४६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५८

अपने शिखरोंका जो भार । नहीं जानता है गिरिवर ।
भूमिका बोझ वराहावतार । नहीं जानता जैसे ॥ ४७ ॥
अनेक भूतोंके भारसे । पृथ्वी नहीं दबती जैसे ।
वह भी अनेक द्वंद्वोंसे । दबता नहीं ॥ ४८ ॥
नदी नद अनेक आते । जल-प्रवाह तीव्र लाते ।
समुद्र उसे समा लेते । अपनेमें जैसे ॥ ४९ ॥
वैसे उसके पास कभी कहीं । न सहना ऐसे कुछ भी नहीं ।
सहता जो कुछ है सभी कहीं । स्मरण भी न रखता ॥ ३५० ॥
उसको जो कुछ भी मिलता । उसको अपना कर लेता ।
सहनेका वहां नहीं पता । रहता कहीं ॥ ५१ ॥
यह जो अनाक्रोश क्षमा । जिसके पास प्रियोत्तम ।
जान तू वह है महिमा । ज्ञानका ही ॥ ५२ ॥
ऐसा पुरुष अर्जुन । ज्ञानका मानो जीवन ।
अब करें विवेचन । आर्जवका ॥ ५३ ॥
५ ज्ञानका लक्षण, ऋजुता --
जान तू आर्जव है ऐसे । प्राणका सौजन्य हो जैसे ।
सबपे यह समान-से । रहता जान ॥ ५४ ॥
जैसे मुख देखकर प्रकाश । नहीं देता जिस भांति चंडांश ।
विश्वको एकसा ही अवकाश । जैसे देता गगन ॥ ५५ ॥
ऐसे होता इसका मन । सबसे एक ही समान ।
तथा वैसा होता वर्तन । एकसा ही ॥ ५६ ॥
जगतसे उसका परिचय । निकट का नाता है अतिशय ।
भाषा नहीं वहां आप-परया । सुननेमें आती ॥ ५७ ॥
मेल मिलाप सबसे । पानीका रहता जैसे ।
चित्तमें विकल्प ऐसे । रहता नहीं ॥ ५८ ॥
४५९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

चलता है जैसे पवन । वैसा है उसका मन ।
संदेह लोभ कभी न । करता वह ॥ ५९ ॥
माताके सम्मुख बालक । आता है जैसे निःशंक ।
वैसे ही लोगोंके सम्मुख । उसके विचार ॥ ३६० ॥
कमलिनी जैसे ही सु-विकसित । न करती सुगंध संकुचित ।
वैसे ही नहीं रहता गुपित । अंतःकरण उसका ॥ ६१ ॥
निर्मलता जो रत्नोंकी । रत्नसे भी किरणोंकी ।
आगे होती है मनकी । तथा है कृति ॥ ६२ ॥
सदा वह संकल्प रहित । रहता आत्मानुभव तृप्त ।
नहीं लीपता उसका चित्त । तथा तजता नहीं ॥ ६३ ॥
झेंप कभी दृष्टिमें । संदिग्धता वाणीमें ।
हीन-बुद्धि मनमें । नहीं आती ॥ ६४ ॥
इंद्रियां सभी प्रांजल । निष्प्रपंच औ' निर्मल ।
पंच-प्राण सर्व-काल । रहते मुक्त ॥ ६५ ॥
जैसे अमृतकी धार । वैसे उसका अंतर ।
या इन चिन्होंका घर । होता है वह ॥ ६६ ॥
ऐसा पुरुष धनुर्धर । ऋजुताका है अवतार ।
या ज्ञानने किया घर । उसमें सदैव ॥ ६६ ॥
६ ज्ञानका लक्षण, आचार्योपासना-गुरुभक्ति—
अब मैं इसके अनंतर । कहता गुरु-भक्ति-प्रकार ।
उनको सुन चित्त देकर । धनंजय तू ॥ ६८ ॥
मानो सभी प्रकारके सुदैव । जन्म देती है यह गुरु-सेवा ।
तथा पाता शोकाकुल जीव । ब्रह्म-पद परम ॥ ६९ ॥
कहता हूं आचार्योपासना । प्रकट रूपमें मैं अर्जुन ।
चित्त देकर इसे सुनना । निष्ठा-पूर्वक ॥ ३७० ॥
ज्ञानेश्वरी ४६०

समर्पण भाव-
जैसे सकल जल समृद्धि । लेके घुसती गंगा उदधि ।
या ब्रह्म-पदमें वेद-बुद्धि । करती प्रवेश ॥ ७१ ॥
था लपेटकर संपूर्ण जीवित । सर्वस्व गुण अवगुण सहित ।
करती है अपने सह अर्पित । पतिव्रता पतिको ॥ ७२ ॥
वैसे ही सर्वस्व अपना । गुरु-कुलको समर्पना ।
गुरु-भक्ति गृह बनाना । अपनेको ही ॥ ७३ ॥
गुरु-गृह वियोग-
जो है गुरु-गृहका देश । उससे भरता मानस ।
विरहिणीका मानस । प्रियसे जैसे ॥ ७४ ॥
गुरु-गृहसे जो आता पवन । देख उसका करके सम्मान ।
सनम्र कहता कर नमन । घर पधारिये ॥ ७५ ॥
गुरु-गृहका पागलपन । भाता उस ओरका वचन ।
अमानत जो रखता प्राण । गुरु-गृहमें ही ॥ ७६ ॥
गुरु-आज्ञाने मानो पकड़ा । देहको गावमें है जकड़ा ।
पगहासे गोठेमें बछडा । उसी भांति ॥ ७७ ॥
कब यह बंधन हटेगा । गुरुका दर्शन कब होगा ।
उसको निमिष भी बनेगा । युगसे बडा ॥ ७८ ॥
मानो गुरु-ग्रामसे कोई आया । अथवा गुरुने ही भेज दिया ।
हतायुको आयुष्य मिल गया । ऐसा होता है ॥ ७९ ॥
या सूकता हुवा अंकुर । पा लेता है जलकी धार ।
या अल्पोदकसे सागर । आयी मछली ॥ ३८० ॥
या रंकने पाया निधान । या अंधेने पाये नयन ।
भिक्षुकने पाया महान । इंद्र-पद जैसे ॥ ८१ ॥
नाम सुन ऐसे गुरु-कुलका । महा-सुख बढ़ता उसका ।
मानो आलिंगन गगनका । लिया जैसे ॥ ८२ ॥
४६१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

गुरुकुलमें ऐसी जिसकी । ममता देखता तू उसकी ।
सेवा करता ज्ञान सदाकी । जान तू पार्थ ॥८३॥
गुरुकी मानस पूजा—
तथा जो हृदय-मध्यमें । डूबकर गुरु-प्रेममें ।
लीन होना उपासनामें । गुरुकी नित ॥ ८४ ॥
हृदय-शुद्धिका जो मंदिर । आराध्य जो वहां गुरुबर ।
सर्व-भावसे हे परिवार । बनता आप ॥ ८५ ॥
अथवा हे ज्ञानका मंदिर । उसमें आनंद पीठपर ।
ध्यानामृत-स्नान निरंतर । करता गुरु लिंगका ॥ ८६ ॥
उदय होते ही बोधार्क । बुद्धिके अक्षत सात्विक ।
भरके चढ़ाता त्रंबक- । पर लक्षावधि ॥ ८७ ॥
शुद्ध- त्रिकालमें निरंतर । जीव-दशा धूप जलाकर ।
जलाके ज्ञानारती कर्पूर । उतारता है ॥ ८८ ॥
सामरस्यका रस-पूर्ण । नैवेद्य कर समर्पण ।
आप बन पूजा-ब्राह्मण । गुरुको लिंग ॥ ८९ ॥
गुरुकी मधुरा-भक्ति—
अथवा जीवकी शैया पर । गुरु-पतिका आश्रय कर ।
प्रेम-भोग लेता निरंतर । बुद्धिसे जो ॥ ३९० ॥
कभी किसी समयमें ऐसे । अनुराग भरे हृदयसे ।
गुरु-स्मरण होता है जिसे । कहे क्षीर-सागर ॥ ९१ ॥
जहां ध्येय-ध्यान अति सुख । शेष-शैया पर जो निर्दोष ।
पहुढा है जो उसको देख । माना है श्री गुरु ॥ ९२ ॥
गुरुकी सेव्य-सेवक तथा वात्सल्य-भक्ति—
चरण-सेवामें वहां लीन । लक्ष्मीको अपना रूप मान ।
गरुड हो करता नमन । आप ही जो ॥ ९३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६२

नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता ।
ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥
कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे ।
स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥
या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय ।
बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥
या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर ।
करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥
होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि ।
इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥
बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव ।
उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥
गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर ।
गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥
गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन --
जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर ।
वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥
सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति ।
भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥
करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक ।
जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥
देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न ।
तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥
कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर ।
बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥
४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग

तथा उपयोगी वस्तु आपके । उपकरण सभी यहांके ।
मेरे ही रूप बने उसके । आपकी कृपासे ॥ ६ ॥
ऐसा म मांगूंगा वर । हां कहेंगे गुरु वर ।
फिर वह परिवार । बनूंगा मैं ॥ ७ ॥
गुरु-जीवनमें संपूर्ण समरसता—
उपकरण जात सकल । बन जाऊंगा मैं ही केवल ।
शुश्रूशा होगी तब सकल । वैभव-युक्त बन ॥ ८ ॥
गुरुवर माय अनेकोंकी । किंतु कर लूंगा मैं एककी ।
रज बनके पद-तलकी । उनकी कृपासे ॥ ९ ॥
पगलाऊंगा गुरु-अनुराग । लेंगे वे एक पत्नी-योग ।
मुझमें गुरु-अनुराग । लेगा क्षेत्र-संन्यास ॥ ४१० ॥
कितना ही बहे समीर । चार दिशाओंके अंदर ।
वैसे गुरु-कृपा-पंजर । बनूंगा मैं ॥ ११ ॥
अपने गुणोंका कर भूषण । गुरु-सेवा-स्वामिनीके चरण ।
सजाऊंगा बन मैं आच्छादन । भक्ति-पूर्वक ॥ १२ ॥
गुरु-स्नेहकी होगी वृष्टि । तले मैं पृथ्वी बन तुष्टि ।
पावुं ऐसी इच्छाकी सृष्टि । करता रहता ॥ १३ ॥
तथा श्रीगुरुका भवन । आप ही मैं सर्वस्व बन ।
करूंगा दास्य अनु दिन । वहांका सारा ॥ १४ ॥
आने जानेमें दातार । करेंगे देहरी पार ।
बनूंगा उसका द्वार । तथा द्वार-पाल ॥ १५ ॥
मैं गुरु-पादुका बनूंगा । उनको मैं ही चढ़ाऊंगा ।
छत्र-चामर भी बनूंगा । बारिबारिसे ॥ १६ ॥
बनूंगा मैं पथ-दर्शक । चंवर-धर हस्तक ।
औ' हाथमें ले दीपक । चलूंगा मैं ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६४

उनकी झारी बनूंगा । कुल्लेका पानी भी दूंगा ।
कुल्ल-पडगा भी बनूंगा । बनूंगा सर्वस ॥ १८ ॥
बांधूंगा हडप मैं । झेलूंगा थूक भी मैं ।
करूंगा दासता मैं । स्नानादीकी ॥ १९ ॥
बनूंगा गुरुका आसन । अलंकारिक परिधान ।
उपचारार्थ मैं चंदन । बन जाऊंगा ॥ ४२० ॥
बनूंगा रसोईदार । वैसे ही मैं उपहार ।
आरती मैं बनकर । उतारूं श्री गुरुको ॥ २१ ॥
श्री गुरु करेंगे आरोगन । मै ही बनूंगा पंगत-जन ।
मैं दूंगा भोजनोत्तर पान । आगे बढकर ॥ २२ ॥
उठाऊंगा मैं जूठन । सेज पर बिछावन ।
तथा चरण-सेवन । करूंगा मैं ही ॥ २३ ॥
आप बनूंगा मैं सिंहासन । करेंगे श्री गुरु आरोहण ।
तब होगा पूर्णत्व ही जान । सेवा-धर्मका ॥ २४ ॥
तथा श्री गुरूका मन । करेगा किसीका ध्यान ।
विषय जो विलक्षण । बन जाऊं मैं ॥ २५ ॥
श्रवणांगणमें श्री गुरूके । बनूंगा शब्द लक्षके ।
स्पर्श होगा जहां अंगांगके । बनूंग मैं वह ॥ २६ ॥
तथा श्रीगुरुके नयन । स्नेह-पूर्ण अवलोकन ।
करेंगे जो रूप-दर्शन । बनूंगा मैं आप ॥ २७ ॥
उनकी रसनाको जो रुचेगा । सभी वे रस मैं बन जाऊंगा ।
सुगंध-रूपसे मैं ही करूंगा । घ्राण-सेवा ॥ २८ ॥
ऐसे ब्रह्म-मनोगत । श्रीगुरु-सेवा समस्त ।
बनकर वस्तु जात । करूंगा मैं ॥ २९ ॥
जब तक रहेगा यह शरीर । तब तक होगी सेवा भी सुंदर ।
देहांत पर होगा जो चमत्कार । सुनो बुध्दिका ॥ ४३० ॥
४६५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(59)

रज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान ।
पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥
मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक ।
वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥
श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति ।
बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥
झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार ।
पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥
करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश ।
शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥
जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत ।
नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥
ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन ।
होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥
रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता ।
गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥
कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत ।
करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥
हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता ।
मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥
कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल ।
करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥
गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष ।
गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥
गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन ।
गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६६

गुरु-संप्रदाय है धर्म । वही उसका वर्णाश्रम ।
गुरु-सेवा ही नित्य-कर्म । उसके लिये ॥ ४४ ॥
गुरु-क्षेत्र गुरु-देवता । गुरु ही माता तथा पिता ।
इसके बिना न जानता । मार्ग अन्य ॥ ४५ ॥
श्री गुरुका ही है द्वार । उसका सर्वस्व-सार ।
गुरु-दास सहोदर । मानता प्रेमसे ॥ ४६ ॥
सदैव जिसका वक्त्र । गाता गुरु-नाम-मंत्र ।
गुरु-वाक्य बिन शास्त्र । न छूता जो ॥ ४७ ॥
श्री गुरुका पादोदक । जैसे भी हो जो उदक ।
सब तीर्थसे अधिक । मानता वह ॥ ४८ ॥
श्री गुरुका वह जूठन । सहसा पाकर प्रसन्न ।
होकर समाधि भी लीन । मानता वह ॥ ४९ ॥
गुरु-चरणके जो रज-कण । उडाता ज्यों सहज श्रीचरण ।
तदर्थ कैवल्य-सुख-दान । करता वह लीलासे ॥ ४५० ॥
अजी ! करना कितना विस्तार । गुरु-भक्तिका नहीं ओर-छोर ।
लहराया गुरु-भक्ति-सागर । कहा गया इतना ॥ ५१ ॥
जिसे प्रेम है इस भक्तिका । औत्सुक्य भी इस विषयका ।
रस न आता बिना सेवाका । चित्तमें अन्य ॥ ५२ ॥
तत्व-ज्ञानका वह आधार । ज्ञान लेता उससे आकार ।
ऐसा वह प्रत्यक्ष ईश्वर । ज्ञान उसका भक्त ॥ ५३ ॥
जान देता वहां साक्षात्कार । प्रत्यक्ष हो ज्ञान मुक्त-द्वार ।
विश्वमें वह अपरंपार । होता इस भांति ॥ ५४ ॥
गुरु-सेवामें मेरा आदर । अंतःकरणमें भर-पूर ।
इसलिये किया है विस्तार । इस विषयका ॥ ५५ ॥
वैसे मैं लूला हूं हाथोंसे । अंधा हूं भजन-ध्यानसे ।
लंगडा हूं गुरु-शुश्रूषासे । ऐसा मंद बुद्धि ॥ ५६ ॥
४६७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

गुरु गुण-गानेमें मै हूं मूक । आलसी ऐसा उदर पोषक ।
मनमें गुरु-अनुराग नेक । रहा सदैव ॥ ५७ ॥
यही है एक कारण । यह शरीर पोषण ।
करना पड़ा रक्षण । कहता ज्ञानदेव ॥ ५८ ॥
करके यह विस्तार सहन । दिया सेवा अवसरका दान ।
अब करूंगा सार्थ कथन । केवल-मात्र ॥ ५९ ॥
अजी ! सुनो सुनो श्रीकृष्ण । वह भूत-भार-सहिष्णु ।
कहता है वह श्रीविष्णु । सुनता पार्थ ॥ ४६० ॥
६ ज्ञानका लक्षण, पावित्र्य—
अजी ! शुचित्व जो है ऐसा। जिसके पास दीखे ऐसा।
तन मन बना हो जैसा । कर्पूरसे ही ॥ ६१॥
अथवा रत्नका है अंकुर । जैसे स्वच्छ अंदर बाहर ।
वैसे ही प्रकाशता भास्कर । अंतरबाह्य ॥ ६२ ॥
कर्मसे शरीर निर्मल । ज्ञानसे हृदय उज्ज्वल ।
अंतर्बाह्य ऐसा सोज्वल । परिशुद्ध ॥ ६३ ॥
मृत्तिका और जल । होता बाहर मेल ।
निर्मल होते बोल । वेदके जैसे ॥ ६४ ॥
चाहे जब बुद्धिका बल । करता दर्पण उज्ज्वल ।
सोंदणी करता उज्वल । कपडेका दाग ॥ ६५ ॥
इस भांति उसका शरीर । कर्मसे हुआ शुद्ध बाहर ।
तथा ज्ञान-दीप है अंतर । तभी परिशुद्ध ॥ ६६ ॥
वैसे सुन तू पांडु-सुता । अंदर जो शुद्ध न होता ।
बाहर जो कर्म करता । वह है उपहास ॥ ६७ ॥
जैसा लाश पर लादा आभूषण । या गर्दभको डाला प्रयाग-स्नान ।
कडुवी तुंबी पर मधु-लेपन । किया वैसे ॥ ६८ ॥
या उजाड-घरमें बंधनवार । अन्न लगाया भूखोंके पेट पर ।
अथवा बिंदी लगायी माथे पर । विधवाने जैसे ॥ ६९ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६८

कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला ।
वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥
वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका ।
गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥
अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल ।
किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥
इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग ।
ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥
इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया ।
अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥
सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित ।
स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥
जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते ।
कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥
बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता ।
जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥
वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत ।
किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥
किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन ।
नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥
या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना ।
पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥
जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल ।
कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥
पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता ।
वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥
४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ ।
जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥
८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य—
तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता ।
वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥
लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ ।
किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥
बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे ।
सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥
अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर ।
वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥
चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल ।
भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥
पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन ।
वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥
वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक ।
पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥
जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल ।
वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥
दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता ।
शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥
आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे ।
आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥
निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित ।
किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७०

आकाश भी है यदि टूटता । भूमिका मध्य-बिंदु ढलता ।
तो भी परावृत्त नहीं होता । चित्तसे वह ॥ ९५ ॥
हाथी पे किया फूलसे प्रहार । उसको नहीं लगता है मार ।
वैसे तीखे दुर्वचन प्रहार । उसको न करें अशांत ॥ ९६ ॥
जैसे क्षीरार्णव-कल्लोल । न कंपाता मंदराचल ।
या प्रचंड अग्निका ज्वाल । नहीं जलाता आकाश ॥ ९७ ॥
आती जाती है मानो लहर । किंतु चित्त न होता अस्थिर ।
क्षमा-धैर्यका वह आधार । कल्पांतमें भी ॥ ९८ ॥
स्थैर्यकी यह परि-भाषा । कही है मैंने सविशेष ।
देख यह लक्षण-दशा । अति स्पष्ट ॥ ९९ ॥
पराक्रम-पूर्ण यह स्थिरता । अपनेमें जो अंतर्बाह्य पाता ।
ज्ञानका सागर ही बनता । अपने आप ॥ ५०० ॥
९ ज्ञानका लक्षण, इंद्रिय-निग्रह—
सांप जैसे शत्रु का घर । सैनिक अपना हत्यार ।
लोभी अपना भंडार । नहीं भूलते ॥ १ ॥
अथवा इकलौता बालक । माताका सर्वस होता नेक ।
मधुपे जैसे मधु-मक्षिका । लोभिन होती ॥ २ ॥
इस भांति जो अर्जुन । करता स्वचित्त जतन ।
उन्हे न देता कभी स्थान । इन्द्रिय-द्वारमें ॥ ३ ॥
कहुता काम-भकाऊ सुनेगी । या आशाकी चुडैल देखेगी ।
अंतःकरणकी स्थिति जानेगी । इससे डरता हूं ॥ ४ ॥
बाहरकी ढीलको जैसे । साहसी पुरुष भी वैसे ।
मुट्ठीमें ही रखता वैसे । अपनी वृत्तिको ॥ ५ ॥
रखता है संयममें नित । अंतरको रखके सचेत ।
रखता तनको नियमित । आजीवन ॥ ६ ॥
४७१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

मनके महाद्वार पर । प्रत्याहारके थाने पर ।
यम-दमके चौकीदार । बिठाता सदैव ॥ ७॥
आधार-नाभि-कंठमें । बंध-त्रयके घरमें ।
चन्द्र-सूर्य संपुटमें । सुलाता नित ॥ ८ ॥
समाधि-शैयाके पास पार्थ । लांघ रखता ध्यान सतत ।
तथा चित्त-चैतन्यमें रत । रखता उमगसे ॥ ९ ॥
यह जो चित्तकी स्थिति है । कहाता चित्त-निग्रह है ।
यही सदैव विजय है । ज्ञानका ही ॥ ५१० ॥
जिसकी आज्ञा सदैव अर्जुन । झेलता रहता अंतःकरण।
उसको मनुष्याकारमें जान । आज्ञा-स्वयं ॥ ११ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
१० ज्ञानका लक्षण, वैराग्य—
विषयोंके विषयमें । सदा वैराग्य मनमें ।
भर आता उमंगमें । जिसके है ॥ १२ ॥
वमन किया हुवा अन्न । न चाहता रसना-मन ।
न होती इच्छा-अलिंगन । करने की प्रेतसे ॥ १३ ॥
जैसे विष भोजन नहीं भाता । जलते घरमें न जाया जाता ।
व्याघ्र-गव्हहरमें नहीं करता । वसति-स्थान ॥ १४ ॥
तप्त लोह-रसमें जैसे । कूदा नहीं जाता है वैसे ।
तकिया न करता जैसे । अजगरका कोई ॥ १५ ॥
इस भांति जिसको अर्जुन । विषय-वार्ता न भाती जान ।
इन्द्रिय-सुखमें विषयान्न । नहीं जाने देता ॥ १६ ॥
चित्तमें निरहंकार विषयोंमें विरक्तता ।
जन्म-मृत्यु-जरा रोग दुःख दोष विवेचना ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७२

विषयोंमें जो आलस्य । शरीरमें सदा काश्यं ।
शम-दममें स्वारस्य । रहता जिसका ॥ १७ ॥
तप-व्रतोंका सम्मिलन । होता है उसका जीवन ।
मानता युगांत समान । जनमें आनेको ॥ १८ ॥
योगाभ्यासमें आस । विजनोंमें उल्हास ।
जन-संगकी त्रास । भाती नहीं ॥ १९ ॥
शर-शैयापे शयन । पूय-पंकमें लुंटन ।
वैसे ही भोगता मान । विषय भोग ॥ ५२० ॥
तथा स्वर्ग-प्राप्तिकी बात । सुननेमें भी घृणा पार्थ ।
मानो वह श्वान-पिशित । सडा हुवा जो ॥ २१ ॥
यह है विषय-वैराग्य । आत्म-लाभका जो सौभाग्य ।
इससे ब्रह्मानंद-योग्य । होता जीव ॥ २२ ॥
उभय भोगमें जो त्रास । पाता है जिसका मानस ।
वहां जान करता वास । ज्ञान सदैव ॥ २३ ॥
११ ज्ञानका लक्षण, अनहंकार—
करता जो निष्ठा पूर्वक । सत्कार्य नित्य नैमित्तिक ।
कर्तृत्व-भावसे अलीक । रहता अलिप्त ॥ २४ ॥
वर्णाश्रमके पोषक । कर्म नित्य-नैमित्तिक ।
करें नियम-पूर्वक । अखंडित ॥ २५ ॥
किंतु यह सब मैंने किया । या यह मुझसे सिध्द भया ।
स्मरणमें भी न रखा गया । कभी किंचित ॥ २६ ॥
सहसा जैसा पांडुकुमार । वायुका होता सर्व-संचार ।
या उदय होता है भास्कर । निराभिमानसे ॥ २७ ॥
या श्रुतिके स्वाभाविक बोल । या गंगाकी निरुद्देश्य चाल ।
उसके व्यवहार सकल । ऐसे अहंकार शून्य ॥ २८ ॥
४७३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(60)

उचित-समय जैसे वृक्ष फलते । हम फले या नहीं यह न जानते ।
ऐसी वृक्ष-वृत्तिसे जो हैं रहते । कर्म रत सदैव ॥ २९ ॥
ऐसे मन कर्म-वचन । अहंकार रहित जीवन ।
मणि-मालाका खींचा जान । बीचका सूत्र ॥ ५३० ॥
संबंध बिन जैसे बादल । आकाशमें चलते हैं चाल ।
ऐसे कर्म उसके सरल । तनसे होते हैं ॥ ३१ ॥
शराबीके तनपे वस्त्र । या चित्रके हाथमें शस्त्र ।
बैल पर लादा है शास्त्र । वैसे ही अर्जुन ॥ ३२ ॥
उसको जैसे इस शरीरमें । मैं हूं इसका भान न हो मनमें ।
निरहंकारिता है सहजमें । कहते इसको ॥ ३३ ॥
संपूर्ण जहां यह दीखता । वहीं है ज्ञान घर करता ।
नहीं है यहां आवश्यकता । संदेहकी कोई ॥ ३४ ॥
१२ ज्ञानका लक्षण, गुणदोष-दर्शन—
जन्म मृत्यु जरा दुःख । व्याधि वार्धक्य कलुष ।
सावध रहता देख । दूरसे जो ॥ ३५ ॥
मांत्रिक जैसे पिशाचका । तथा योगी उपसर्गका ।
राजा आगे पीछे होनेका । देखता पहलेसे ही ॥ ३६ ॥
जैसे वैर जन्मांतरका । साप न जाने भूलनेका ।
वैसे वह पूर्व जन्मका । धोता दोष ॥ ३७ ॥
आंखमें कंकर न घुलता । घावमें बरछा न सहता ।
वैसा वह दुःख न भूलता । जन्म-जन्मका ॥ ३८ ॥
पूय-गर्तमें मैं गया । मूत्र-रंध्रमें निभाया ।
सहज ही स्वाद लिया । कुच-स्वेदका ॥ ३९ ॥
सदैव वह इस प्रकार । करता है जन्मका विचार ।
जिससे हो जन्म बार बार । ऐसा न करता कुछ ॥ ५४० ॥
ज्ञानेश्वरी ४७४

जैसे दांव हारा हुवा जुवारी । जीतनेमें करता फुरहरी ।
अथवा जैसे बापका वैरी । मारता पुत्र ॥ ४१ ॥
हत्याके बाद अपनोंका नेक । बदला लेता है अंग-रक्षक ।
ऐसे यह जन्मका है देख । पीछा करता ॥ ४२ ॥
किंतु जन्मकी जो लाज । न छोडता अपनी निज ।
संभावित जैसे निस्तेज । सहता नहीं ॥ ४३ ॥
तथा मृत्यु आगे आयेगी । कल्पांतमें जा जकडेगी ।
किंतु उसकी आज होगी । तत्परता जागृत ॥ ४४ ॥
मध्य-प्रवाह अथाह सुनकर । तैरनेवाला जैसे किनारे पर ।
सावधान हो कमर बांधकर । होता है सिद्ध ॥ ४५ ॥
या रणमें जानेसे पूर्व अर्जुन । संभालकर होता है सावधान ।
घाव लगनेसे पूर्व ही ओढन । आगे करता जैसे ॥ ४६ ॥
या जानके आगेका पथ-वध । पथिक होता पहले सावध ।
अथवा मृत्युसे पूर्व औषध । करते जैसे ॥ ४७ ॥
नही तो सदैव ऐसा होता । जलते घरमें है फंसता ।
तब कुंआं खोदने जो लगता । व्यर्थ होता जान ॥ ४८ ॥
अथाह गर्तमें डूबे·जैसे पत्थर । संसार सागरमें वैसे धनुर्धर ।
डूब गये हैं कई चीख चीखकर । ऐसा करेगा कौन ॥ ४९ ॥
जिसका रहता समर्थसे वैर । तब वह जैसा आठ ही पहर ।
रहता है बांधकर तलवार । सावधान हो ॥ ५५० ॥
बाप मानता कन्या उपवर । या सन्यासी रहता मरने तैयार ।
वैसे वह सदैव मृत्युका विचार । करता रहता है ॥ ५१ ॥
ऐसे जन्मसे जन्म-निवारण । औ' मृत्युसे कर मृत्यु-हरण ।
स्वयं रहता करके धारण । अपना निज-रुप ॥ ५२ ॥
उसके घरमें ज्ञानका । अभाव न रहा जिसका ।
गया दुःख जन्म-मृत्युका । धनंजय ॥ ५३ ॥
४७५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

न छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर ।
तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥
कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर ।
होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥
जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य ।
वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥
लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध ।
जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥
जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर ।
वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥
ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे ।
होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥
भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे ।
गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥
गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता ।
उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥
रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें ।
वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥
तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर ।
बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥
उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल ।
दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥
अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक ।
वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥
जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके ।
वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७६