ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउचित-समय जैसे वृक्ष फलते । हम फले या नहीं यह न जानते ।
ऐसी वृक्ष-वृत्तिसे जो हैं रहते । कर्म रत सदैव ॥ २९ ॥
ऐसे मन कर्म-वचन । अहंकार रहित जीवन ।
मणि-मालाका खींचा जान । बीचका सूत्र ॥ ५३० ॥
संबंध बिन जैसे बादल । आकाशमें चलते हैं चाल ।
ऐसे कर्म उसके सरल । तनसे होते हैं ॥ ३१ ॥
शराबीके तनपे वस्त्र । या चित्रके हाथमें शस्त्र ।
बैल पर लादा है शास्त्र । वैसे ही अर्जुन ॥ ३२ ॥
उसको जैसे इस शरीरमें । मैं हूं इसका भान न हो मनमें ।
निरहंकारिता है सहजमें । कहते इसको ॥ ३३ ॥
संपूर्ण जहां यह दीखता । वहीं है ज्ञान घर करता ।
नहीं है यहां आवश्यकता । संदेहकी कोई ॥ ३४ ॥
१२ ज्ञानका लक्षण, गुणदोष-दर्शन—
जन्म मृत्यु जरा दुःख । व्याधि वार्धक्य कलुष ।
सावध रहता देख । दूरसे जो ॥ ३५ ॥
मांत्रिक जैसे पिशाचका । तथा योगी उपसर्गका ।
राजा आगे पीछे होनेका । देखता पहलेसे ही ॥ ३६ ॥
जैसे वैर जन्मांतरका । साप न जाने भूलनेका ।
वैसे वह पूर्व जन्मका । धोता दोष ॥ ३७ ॥
आंखमें कंकर न घुलता । घावमें बरछा न सहता ।
वैसा वह दुःख न भूलता । जन्म-जन्मका ॥ ३८ ॥
पूय-गर्तमें मैं गया । मूत्र-रंध्रमें निभाया ।
सहज ही स्वाद लिया । कुच-स्वेदका ॥ ३९ ॥
सदैव वह इस प्रकार । करता है जन्मका विचार ।
जिससे हो जन्म बार बार । ऐसा न करता कुछ ॥ ५४० ॥
ज्ञानेश्वरी ४७४