ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुरुकुलमें ऐसी जिसकी । ममता देखता तू उसकी ।
सेवा करता ज्ञान सदाकी । जान तू पार्थ ॥८३॥
गुरुकी मानस पूजा—
तथा जो हृदय-मध्यमें । डूबकर गुरु-प्रेममें ।
लीन होना उपासनामें । गुरुकी नित ॥ ८४ ॥
हृदय-शुद्धिका जो मंदिर । आराध्य जो वहां गुरुबर ।
सर्व-भावसे हे परिवार । बनता आप ॥ ८५ ॥
अथवा हे ज्ञानका मंदिर । उसमें आनंद पीठपर ।
ध्यानामृत-स्नान निरंतर । करता गुरु लिंगका ॥ ८६ ॥
उदय होते ही बोधार्क । बुद्धिके अक्षत सात्विक ।
भरके चढ़ाता त्रंबक- । पर लक्षावधि ॥ ८७ ॥
शुद्ध- त्रिकालमें निरंतर । जीव-दशा धूप जलाकर ।
जलाके ज्ञानारती कर्पूर । उतारता है ॥ ८८ ॥
सामरस्यका रस-पूर्ण । नैवेद्य कर समर्पण ।
आप बन पूजा-ब्राह्मण । गुरुको लिंग ॥ ८९ ॥
गुरुकी मधुरा-भक्ति—
अथवा जीवकी शैया पर । गुरु-पतिका आश्रय कर ।
प्रेम-भोग लेता निरंतर । बुद्धिसे जो ॥ ३९० ॥
कभी किसी समयमें ऐसे । अनुराग भरे हृदयसे ।
गुरु-स्मरण होता है जिसे । कहे क्षीर-सागर ॥ ९१ ॥
जहां ध्येय-ध्यान अति सुख । शेष-शैया पर जो निर्दोष ।
पहुढा है जो उसको देख । माना है श्री गुरु ॥ ९२ ॥
गुरुकी सेव्य-सेवक तथा वात्सल्य-भक्ति—
चरण-सेवामें वहां लीन । लक्ष्मीको अपना रूप मान ।
गरुड हो करता नमन । आप ही जो ॥ ९३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६२