ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे दांव हारा हुवा जुवारी । जीतनेमें करता फुरहरी ।
अथवा जैसे बापका वैरी । मारता पुत्र ॥ ४१ ॥
हत्याके बाद अपनोंका नेक । बदला लेता है अंग-रक्षक ।
ऐसे यह जन्मका है देख । पीछा करता ॥ ४२ ॥
किंतु जन्मकी जो लाज । न छोडता अपनी निज ।
संभावित जैसे निस्तेज । सहता नहीं ॥ ४३ ॥
तथा मृत्यु आगे आयेगी । कल्पांतमें जा जकडेगी ।
किंतु उसकी आज होगी । तत्परता जागृत ॥ ४४ ॥
मध्य-प्रवाह अथाह सुनकर । तैरनेवाला जैसे किनारे पर ।
सावधान हो कमर बांधकर । होता है सिद्ध ॥ ४५ ॥
या रणमें जानेसे पूर्व अर्जुन । संभालकर होता है सावधान ।
घाव लगनेसे पूर्व ही ओढन । आगे करता जैसे ॥ ४६ ॥
या जानके आगेका पथ-वध । पथिक होता पहले सावध ।
अथवा मृत्युसे पूर्व औषध । करते जैसे ॥ ४७ ॥
नही तो सदैव ऐसा होता । जलते घरमें है फंसता ।
तब कुंआं खोदने जो लगता । व्यर्थ होता जान ॥ ४८ ॥
अथाह गर्तमें डूबे·जैसे पत्थर । संसार सागरमें वैसे धनुर्धर ।
डूब गये हैं कई चीख चीखकर । ऐसा करेगा कौन ॥ ४९ ॥
जिसका रहता समर्थसे वैर । तब वह जैसा आठ ही पहर ।
रहता है बांधकर तलवार । सावधान हो ॥ ५५० ॥
बाप मानता कन्या उपवर । या सन्यासी रहता मरने तैयार ।
वैसे वह सदैव मृत्युका विचार । करता रहता है ॥ ५१ ॥
ऐसे जन्मसे जन्म-निवारण । औ' मृत्युसे कर मृत्यु-हरण ।
स्वयं रहता करके धारण । अपना निज-रुप ॥ ५२ ॥
उसके घरमें ज्ञानका । अभाव न रहा जिसका ।
गया दुःख जन्म-मृत्युका । धनंजय ॥ ५३ ॥
४७५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग