ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनके महाद्वार पर । प्रत्याहारके थाने पर ।
यम-दमके चौकीदार । बिठाता सदैव ॥ ७॥
आधार-नाभि-कंठमें । बंध-त्रयके घरमें ।
चन्द्र-सूर्य संपुटमें । सुलाता नित ॥ ८ ॥
समाधि-शैयाके पास पार्थ । लांघ रखता ध्यान सतत ।
तथा चित्त-चैतन्यमें रत । रखता उमगसे ॥ ९ ॥
यह जो चित्तकी स्थिति है । कहाता चित्त-निग्रह है ।
यही सदैव विजय है । ज्ञानका ही ॥ ५१० ॥
जिसकी आज्ञा सदैव अर्जुन । झेलता रहता अंतःकरण।
उसको मनुष्याकारमें जान । आज्ञा-स्वयं ॥ ११ ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥
१० ज्ञानका लक्षण, वैराग्य—
विषयोंके विषयमें । सदा वैराग्य मनमें ।
भर आता उमंगमें । जिसके है ॥ १२ ॥
वमन किया हुवा अन्न । न चाहता रसना-मन ।
न होती इच्छा-अलिंगन । करने की प्रेतसे ॥ १३ ॥
जैसे विष भोजन नहीं भाता । जलते घरमें न जाया जाता ।
व्याघ्र-गव्हहरमें नहीं करता । वसति-स्थान ॥ १४ ॥
तप्त लोह-रसमें जैसे । कूदा नहीं जाता है वैसे ।
तकिया न करता जैसे । अजगरका कोई ॥ १५ ॥
इस भांति जिसको अर्जुन । विषय-वार्ता न भाती जान ।
इन्द्रिय-सुखमें विषयान्न । नहीं जाने देता ॥ १६ ॥
चित्तमें निरहंकार विषयोंमें विरक्तता ।
जन्म-मृत्यु-जरा रोग दुःख दोष विवेचना ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४७२