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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 535

नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता ।
ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥
कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे ।
स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥
या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय ।
बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥
या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर ।
करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥
होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि ।
इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥
बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव ।
उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥
गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर ।
गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥
गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन --
जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर ।
वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥
सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति ।
भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥
करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक ।
जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥
देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न ।
तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥
कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर ।
बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥
४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग