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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 541

कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला ।
वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥
वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका ।
गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥
अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल ।
किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥
इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग ।
ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥
इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया ।
अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥
सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित ।
स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥
जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते ।
कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥
बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता ।
जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥
वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत ।
किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥
किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन ।
नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥
या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना ।
पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥
जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल ।
कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥
पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता ।
वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥
४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग