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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 538

रज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान ।
पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥
मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक ।
वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥
श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति ।
बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥
झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार ।
पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥
करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश ।
शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥
जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत ।
नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥
ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन ।
होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥
रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता ।
गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥
कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत ।
करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥
हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता ।
मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥
कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल ।
करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥
गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष ।
गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥
गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन ।
गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४६६