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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 529

सामान्य और विशेष एक । मिलाया हुवा जो आप देख ।
उसको कानसे मुख तक । न ले जायेंगे ॥ २२ ॥
ग्रसता संदेहका खल-मल । जब शुध्द-प्रमेय जो निर्मल ।
पैरोंकी स्फूर्ति आती उसी पल । पीछे भागनेकी ॥ २३ ॥
अजी ! जल-कुंभीसे । ढके हुए नीरसे ।
कभी न करे जैसे । क्रीडा हंस ॥ २४ ॥
चांदनी जो बादल पारसे । उसको नहीं देखता जैसे ।
आंख उठाकर कौतुकसे । चकोर पक्षी कभी ॥ २५ ॥
वैसे आप नहीं लेंगे पास । इस ग्रंथको इच्छासे खास ।
करेंगे सक्रोध उपहास । सा-शंक निरूपणपे ॥ २६ ॥
न कर संदेह निवारण । किया हो तो मैंने निरूपण ।
उससे कभी आपका मन । मिलेगा क्या मुझको ? ॥ २७ ॥
तथा मेरा जो यह् संपूर्ण । कहनेका है सब कारण ।
आपका प्रसाद प्रति-क्षण । सदा सन्मुख हो ॥ २८ ॥
गीतार्थ आपको प्रिय मान । गीताको किया आश्रय-स्थान ।
तथा मान मैं प्राण-समान । बोलता हूं आपसे ॥ २९ ॥
आप अपना जो सर्वस्व देंगे । अपना स्वत्व यह् छुडालेंगे ।
ग्रंथ नहीं यह् बंधक मानेंगे । सर्व-भावसे ॥ ३३० ॥
अपने सर्वस्वका लोभ धरेंगे । या बंधकका अनादर करेंगे ।
गीता तथा मेरी भी आप मानेंगे । एक ही गति ॥ ३१ ॥
चाहता हूं मैं केवल । कृपा आपकी निर्मल ।
इसीलिये मैं ये बोल । बोलता हूं ॥ ३२ ॥
बैठे हैं आप रसिक जन । आपके योग्य देना व्याख्यान ।
तभी मतांतरका कथन । किया सब ॥ ३३ ॥
इससे कथा-विस्तार भया । श्लोकार्थसे कुछ दूर गया ।
सो मैंने क्षमायाचन किया । आपत्य-भावसे ॥ ३४ ॥
४५७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
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