ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमर्पण भाव-
जैसे सकल जल समृद्धि । लेके घुसती गंगा उदधि ।
या ब्रह्म-पदमें वेद-बुद्धि । करती प्रवेश ॥ ७१ ॥
था लपेटकर संपूर्ण जीवित । सर्वस्व गुण अवगुण सहित ।
करती है अपने सह अर्पित । पतिव्रता पतिको ॥ ७२ ॥
वैसे ही सर्वस्व अपना । गुरु-कुलको समर्पना ।
गुरु-भक्ति गृह बनाना । अपनेको ही ॥ ७३ ॥
गुरु-गृह वियोग-
जो है गुरु-गृहका देश । उससे भरता मानस ।
विरहिणीका मानस । प्रियसे जैसे ॥ ७४ ॥
गुरु-गृहसे जो आता पवन । देख उसका करके सम्मान ।
सनम्र कहता कर नमन । घर पधारिये ॥ ७५ ॥
गुरु-गृहका पागलपन । भाता उस ओरका वचन ।
अमानत जो रखता प्राण । गुरु-गृहमें ही ॥ ७६ ॥
गुरु-आज्ञाने मानो पकड़ा । देहको गावमें है जकड़ा ।
पगहासे गोठेमें बछडा । उसी भांति ॥ ७७ ॥
कब यह बंधन हटेगा । गुरुका दर्शन कब होगा ।
उसको निमिष भी बनेगा । युगसे बडा ॥ ७८ ॥
मानो गुरु-ग्रामसे कोई आया । अथवा गुरुने ही भेज दिया ।
हतायुको आयुष्य मिल गया । ऐसा होता है ॥ ७९ ॥
या सूकता हुवा अंकुर । पा लेता है जलकी धार ।
या अल्पोदकसे सागर । आयी मछली ॥ ३८० ॥
या रंकने पाया निधान । या अंधेने पाये नयन ।
भिक्षुकने पाया महान । इंद्र-पद जैसे ॥ ८१ ॥
नाम सुन ऐसे गुरु-कुलका । महा-सुख बढ़ता उसका ।
मानो आलिंगन गगनका । लिया जैसे ॥ ८२ ॥
४६१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग