ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! कौरमें जब कंकड आता । उसको दूर करना ही पडता ।
उसे निकालनेमें समय जाता । दूषण है क्या यह ? ॥ ३५ ॥
बालक जब चोरसे बचकर । आता है अपने घर कर देर ।
माता नहीं बोलती डांट कर । प्रसन्न हो कहती आया ! ॥ ३६ ॥
किंतु यह बात ऐसी नहीं है । आपने सहा जो भला किया है।
भगवानने जो आगे कहा है । वह सुनिये अब ॥ ३७ ॥
कहता उन्मेख सुलोचन । सावध हो तू अर्जुन ।
कहूंगा अब तुझे ज्ञान । परिपूर्ण जो ॥ ३८ ॥
४ ज्ञानका लक्षण, शांति-
बिन आक्रोश जहां । क्षमा होती है कहां ।
ज्ञान होता है वहां । जान निश्चित ॥ ३९ ॥
गहरे सरोवरमें जैसे । कमलिनी बढती है वैसे ।
या सुदैवीके घरमें जैसे । बढती संपत्ति ॥ ३४० ॥
उसी भांतिसे हे पार्थ । बढती क्षमा यथार्थ ।
उसके लक्षण सार्थ । कहते अब ॥ ४१ ॥
जैसे प्रिय-भूषण । करते हैं धारण ।
वैसे है जो सहन । करता सर्व ॥ ४२ ॥
त्रिविध तापोंका संपूर्ण । हुवा उनपे आक्रमण ।
तो भी उसका चित्त जान । नहीं होता चंचल ॥ ४३ ॥
अपेक्षित पाके मन । होता है जैसे प्रसन्न ।
अनपेक्षितका जान । वही आदर ॥ ४४ ॥
मानापमानको जो सहता । सुख दुःखको है समा लेता ।
निंदा-स्तुतिको भी मानता । एक समान ॥ ४५ ॥
उष्मासे जो न तपता । शीतसे जो न कांपता ।
न किसीसे है डरता । किसी समय ॥ ४६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४५८