ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजिसने पकडे मत्पाद । भले ही होवे चतुष्पाद ।
उनको मिला महापद । मेरे सानिध्यका ॥ ९३ ॥
इसीलिए जी भक्त । नहीं होते चिंतित ।
उनका समुद्धर्त्ता । मैं हूं सदा ॥ ९४ ॥
तथा जबसे की भक्ति । दी मुझको चित्त-वृत्ति ।
उनके फंदकी शक्ति । खींचती मुझे ॥ ९५ ॥
इस कारणसे अर्जुन । कर भक्तिका आचरण ।
यह मंत्र रखो स्मरण । मनमें सदा ॥ ९६ ॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
मन बुद्धि आदिका मुझमें लीन होनेसे मद्रूप हो जाता है—
अजी ! मानस यह एक । मेरे स्वरूपमें वृत्तिक ।
करके रख तू निष्कंक । निश्चित बुद्धिसे ॥ ९७ ॥
इन दोनों साधनसे । मुझमें रहे प्रेमसे ।
मिलन होगा मुझसे । तेरा निश्चित ॥ ९८ ॥
मन बुद्धिने घर । किया मेरे भीतर ।
रहा क्या भेद और । मेरे तेरेका ॥ ९९ ॥
जैसे ज्योति बुझने पर । मिट जाती कांति सत्वर ।
या अस्त होते ही भास्कर । जाता प्रकाश ॥ १०० ॥
तजता जब तनको प्राण । निकल जाते सभी कण ।
जहां मन-बुद्धिका गमन । वहां अहंकार ॥ १ ॥
इसीलिये मेरे स्वरूपमें । मन बुद्धिके रत आनेमें ।
होगा तू विश्व-व्यापकतामें । मैं ही मान ॥ २ ॥
मनको मुझमें रोक बुद्धि भी मुझमें रख ।
तभी तू फिर निःशंक पाएगा मम रूप ही ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१४