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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 474

प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल ।
इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥
अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात ।
मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल ।
श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥
सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर ।
श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥
उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति ।
तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥
किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन ।
व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥
करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान ।
कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥
उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन ।
इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥
ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित ।
सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥
प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद ।
यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥
भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली ।
अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
ॐ