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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 485

इस बचनमें कहीं । अन्यथा कछु भी नहीं ।
मेरी प्रतिज्ञा है यही । सौगंध पूर्वक ॥ ३ ॥
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥
मद्रूपका क्षणिक अनुभव-अभ्यास-योग—
अथवा यह चित्त । मन बुद्धि सहित ।
मुझको अचुंबित । न दे सके तो ॥ ४ ॥
तब तो ऐसा कर । दिनमें क्षण भर ।
सबको भूलकर । रत हो मुझमें ॥ ५ ॥
जिससे तू निमिष एक । अनुभवेगा मेरा सुख ।
उससे होगा अरोचक । विषय-मात्र ॥ ६ ॥
जैसा शरत्काल आता । सूखते जाती सरिता ।
वैसी छूटेगी ममता । प्रपंचसे ॥ ७ ॥
फिर पूर्णमासीसे जैसे । शशि-बिंब लगता वैसे ।
अमावसमें पूर्णरूपसे । मिट जाता है ॥ ८ ॥
ऐसे वासनासे निकलकर । मुझमें चित्त चुभते जाकर ।
धीरे धीरे वह अर्जुन स्थिर । होगा मद्रूप ॥ ९ ॥
अजी ! अभ्यास योगका अर्थ । एक ही जो है सर्व समर्थ ।
जिससे न होगा कुछ प्राप्त । ऐसा नहीं ॥ ११० ॥
सुन अभ्यासका बल । देता मति अन्तराल ।
व्याघ्र सर्पको प्रांजल । करते इससे ॥ ११ ॥
विषका ही आहार बनता । सागरपे पगसे चलता ।
कोई वाग्ब्रह्मको ही जीतता । अभ्यास बलसे १२ ॥
करना चित्तको शांत असाध्य मुझमें तब ।
अभ्यास योगसे चाह तू मेरी प्राप्तिको कर ॥ ९ ॥
४१५ भक्तियोग