ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
फिर कहता यह सुन । उस भक्तके ये लक्षण ।
उसको मैं अंतःकरण । आसनार्थ देता हूं ॥ ६४ ॥
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥ १५ ॥
भक्त भय-उद्वेग रहित—
जैसे सागरके भीतर । भीत न होता जलचर ।
या जलचरोंसे सागर । उकताता नहीं ॥ ६५ ॥
वैसे ही उन्मत्त जगत । न करता उसे दुखित ।
तथा न ऊबता जगत । उससे कभी ॥ ६६ ॥
अथवा मान तू पांडव । जैसे तनको अवयव ।
नहीं ऊबते वैसे जीव । औ' जीवोंसे वह ॥ ६७ ॥
विश्व ही जैसे देह हो गया । इसलिए प्रिया-प्रिय गया ।
हर्ष शोकादि द्वन्द्व भी गया । द्वैत मिटनेसे ॥ ६८ ॥
ऐसा द्वन्द्वसे जो मुक्त । भय उद्वेग रहित ।
फिर भी अनन्य भक्त । वह मेरा ॥ ६९ ॥
तभी है वह मेरा प्रिय । दिखाऊँ कैसा मेरा हिय ।
वह है मुझमें तन्मय । इससे जीता हूं ॥ १७० ॥
जो है निजानन्दमें तृप्त । मानो ब्रह्मको जन्म प्राप्त ।
पूर्णताका वह है आप्त । वल्लभ जैसा ॥ ७१ ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १६ ॥
ऊबता जो न लोगोंसे न ऊबे उससे जन ।
हर्ष-शोक भय क्रोध न जाने जो मुझे प्रिय ॥ १५ ॥
नहीं व्यथा उदासीन दक्ष निर्मल निस्पृह ।
तजे आरंभ जो सारे भक्त है मुझको प्रिय ॥ १६ ॥
४२१ भक्तियोग
संतका पावन चरित—
न है उसमें अपेक्षा । वैसी ही नहीं उपेक्षा ।
जीवन बिन आकांक्षा । केवल आत्मोत्कर्ष ॥ ७२ ॥
मोक्ष देनेमें उदार । काशी नामका आदर ।
किंतु उसमें शरीर । त्यजना होगा ॥ ७३ ॥
पाप हरता हिमवंत । भयभीत कर जीवित ।
संतका पावन चरित । वैसा नहीं ॥ ७४ ॥
पावन है गंगोदक । पाप तापका शामक ।
किंतु उसमें है एक । डूबनेका भय ॥ ७५ ॥
गहराई जिसकी अपार । किंतु डूबनेका है डर ।
रोकड़ मोक्षका है घर । जीवनमें ही ॥ ७६ ॥
संतोंके चरण स्पर्शसे । मुक्त है गंगा भी पापसे ।
ऐसे संत-संगके कैसे । कहना शुचित्व ॥ ७७ ॥
अजी ! यह रहने दो अब । बना तीर्थोंका आश्रय सब ।
धोकर मनका मल शुभ- । शुचित्वसे ॥ ७८ ॥
होता तन मनसे निर्मल । सूर्यके समान है उज्ज्वल ।
तत्त्वार्थिथोंमें है पायल । ब्रह्म-धनका ॥ ७९ ॥
व्यापक तथा उदास । रहता जैसे आकाश ।
वैसे उसका मानस । सदा-सर्वत्र ॥ १८० ॥
जो है संसार-व्यथासे मुक्त । निरपेक्षाळंकार-भूषित ।
मानो व्याध-बाणसे विमुक्त । विहंगमसा ॥ ८१ ॥
सुखमें जो है लीन सतत । न होती कभी टीस प्रतीत ।
न जाने जैसे लज्जाको प्रेत । उसी भांति ॥ ८२ ॥
तथा कार्यारंभका है नहीं । अहंकार तनिक भी कहीं ।
जैसा निर्इंधन होके वह्नि । बुझ जाता है ॥ ८३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२२
ऐसा हुआ जब उपशम । मोक्ष-सत्रमें लिखाया नाम ।
हुआ है वह निष्काम-काम । धनंजय ॥ ८४ ॥
अर्जुन वह यहीं पर । सोऽहं भावसे भरकर ।
पहुंच चुका उस पार । द्वैत-भावके ॥ ८५ ॥
किंतु भक्ति-सुखके कारण । कर अपना दो विभाजन ।
सेवा धर्मका अंगीकरण । करता आप ॥ ८६ ॥
अन्यको है मैं कहता । फिर स्तोत्र नहीं होता ।
भक्तिका मार्ग दिखाता । योगी वह ॥ ८७ ॥
हमें है उसका व्यसन । उसका ही निज-ध्यान ।
या उसमें ही समाधान । मिलता हमको ॥ ८८ ॥
उसके लिये रूप-धारण । इस विश्वमें अवतरण ।
न्योछावर है उसपे प्राण । सर्व-भावसे ॥ ८९ ॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः ॥ १७ ॥
जो आत्म लाभके समान । सुन्दर कछु नहीं आन ।
तभी भोगमें न दें मन । न हो आनंदित ॥ ९० ॥
आप ही है विश्व बन गया । भेद भाव सहज धो गया ।
तब द्वेश भी है मिट गया । उस पुरुषका ॥ ९१ ॥
जो है अपना संतत्व । कल्पांतमें है अस्तित्व ।
तभी भूतका है स्वत्व । कभी न सोचता ॥ ९२ ॥
तथा उसके परे कुछ भी नहीं । अपना जो है अपने पास यहीं ।
तभी उसकी आकांक्षा है ही नहीं । कुछ भी कभी ॥ ९३ ॥
न उल्लास न संताप न चाह सोच भो नहीं ।
भला बुरा सभी छोडा भजता जो मुझे प्रिय ॥ १७ ॥
४२३ भक्तियोग
बीभत्स है या सुंदर । न जाने वह अंतर ।
जैसे जाने ना भास्कर । दिन औ' रात ॥ ९४ ॥
ऐसे बोधसे केवल । रहता है जो निष्कल ।
फिर भी भजनशील । मुझमें वह ॥ ९५ ॥
उसके समान और । नहीं हमें प्रियकर ।
कहता हूं धनुर्धर । सौगंध तेरी ॥ ९६ ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः ॥ १८ ॥
भक्तकी सम-भावना—
जिसके मनमें पार्था । नहीं वैषम्यकी वार्ता ।
रिपु-मित्रकी समता । रहे सदा ॥ ९७ ॥
अपनोंको प्रकाश देना । परायोंको अंधेरा देना ।
जैसा दीप यह सोचना । जानता नहीं ॥ ९८ ॥
करता जो वृक्ष-छेदन । या करता गाछ-पालन ।
दोनोंको दे छाया समान । जैसा वृक्ष ॥ ९९ ॥
मालीको देता मीठा रस । पेरकको न खट्टा रस ।
सबको है मधुर रस । देता ईख-सा ॥ २०० ॥
शत्रु-मित्रमें तैसा । उसका भाव ऐसा ।
रहता है एकसा । मानापमानमें ॥ १ ॥
तीनों ऋतुओंमें समान । रहता है जैसा गगन ।
वैसा ही एक समान । शीतोष्ण जिसे ॥ २ ॥
दक्षिण उत्तर मारुत । जैसा है मेरु पांडुसुत ।
तैसा सुख दुःख हो प्राप्त । मध्यस्थ है जो ॥ ३ ॥
सम जो शत्रु-मित्रोंमें मानापमानमें सम ।
शीतोष्ण सुख दुःखोंमें क्लिप्त सम-भावसे ॥ १८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२४
चंद्रिकाकी शीतलता । राजा रंककी समता ।
वैसे जो सकळ भूत । है सामान ॥ ४ ॥
संपूर्ण जगत एक । जैसे सेवन उदक ।
वैसे उसकी त्रिलोक । करते चाह ॥ ५ ॥
अंतर बाह्य संग । करके सब अंग ।
शून्य हो अन्तरंग । वस्तुलीन ॥ ६ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ १९ ॥
विश्व ही मेरा घर ऐसी जिसकी मति--
निंदासे जो न खिन्न । स्तुतिसे न प्रसन्न ।
रहे जैसा गगन । निर्लेप ॥ ७ ॥
जो निंदा और स्तुति । रखके एक पांति ।
रमता प्राण-वृत्ति । सदा-सर्वत्र ॥ ८ ॥
सत्यासत्यको जो समान । बोलकर रहता मौन ।
भोगता है सदा उन्मन । अतृप्त भावसे ॥ ९ ॥
लाभसे जो न हरषाता । न अलाभसे कुम्हलाता ।
वर्षाके बिन ना सूखता । समुद्र जैसा ॥ २१० ॥
जैसा वायुका इक ठौर । रहता नहीं है आधार ।
वैसा ही न उसका घर । कहीं रहता ॥ ११ ॥
संपूर्ण आकाश स्थिति । वायुकी नित्य-वसति ।
वैसे है विश्व विश्रांति- । स्थान उसका ॥ १२ ॥
विश्व ही यह मेरा घर । ऐसी मति जिसकी स्थिर ।
या हुआ जो सचराचर । अपनेमें आप ॥ १३ ॥
स्तुति-निंदा तजे मौनी संतुष्ट प्राप्त-भोगमें ।
स्थिर-बुद्धि निराधार भक्त जो है मुझे प्रिय ॥ १९ ॥
४२५ भक्तियोग
(54)
इस पर भी हे पार्थ । मेरे भजनमें आस्था ।
उसको करू मैं माथा । पर मुकुट ॥ १४ ॥
उत्तमको मस्तक । नमाना क्या कौतुक ।
मान देता त्रिलोक । पद रेणुको ॥ १५ ॥
श्रद्धा वस्तुका आदर । करना जानो प्रकार ।
होता है यदि शंकर । श्री गुरु ॥ १६ ॥
रहने दो यह भाषा । करनेमें है प्रशंसा ।
शंभुकी होती सहसा । आत्म-स्तुति ॥ १७ ॥
रहने दो यह उक्ति । कहता है रमापति ।
लेकर करता स्तुति । माथेपे उसे ॥ १८ ॥
अपने भक्तके अलिंगनके लिये दो हाथ कम पडे—
सिद्धि चौथा पुरुषार्थ । लेकर अपने हाथ ।
चला है जो भक्ति-पंथ । देते विश्वको ॥ १९ ॥
कैवल्यका ले अधिकार । करे मोक्षका व्यवहार ।
रहता नम्र जैसा नीर । स्वभावसे ॥ २२० ॥
उसको करूंगा नमस्कार । मुकुट धरूंगा सिरपर ।
चरण हृदय पीठ पर । पूजूंगा मैं ॥ २१ ॥
उसके गुणका भूषण । होगा मेरी वाणीका गान ।
उसकी कीर्तिका श्रवण । प्रेमसे करूंगा ॥ २२ ॥
उसके दर्शनका प्रलोभन । बने मुझ अचक्षुके नयन ।
करूं लीला सुमनसे पूजन । उसका मैं ॥ २३ ॥
अजी ! दो पर दो और । कर लेकर मैं चार ।
आलिंगनार्थ आतुर । आया उसके ॥ २४ ॥
उसके संगके सुखके लिये । आया हूं विदेही मैं देह लिये ।
उसके प्रेम बखानके लिये । वाणी है असमर्थ ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२६
उसका मैं हूं मित्र । उसमें क्या विचित्र ।
सुनता जो चरित्र । उसका वह ॥ २६ ॥
करता है गुणगान । उससे भी मैं प्रसन्न ।
वह है प्राण समान । मुझको प्रिय ॥ २७ ॥
अजी ! यह सांगत । कहा है जो प्रस्तुत ।
भक्तियोग समस्त । योग-रूप ॥ २८ ॥
करता उसका आदर । धरता उसे सिरपर ।
उस स्थितिकी है अपार । श्रेष्ठता सुन ॥ २९ ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥ २० ॥
भक्त क्या ? मुझे अत्यधिक मधुर है—
गोष्ठि है यह रम्य । अमृत धारा धर्म्य ।
करें प्रतीति-गम्य । सुनकर ॥ २३० ॥
श्रद्धाका जिसमें आदर । उरमें इसका विस्तार ।
होता है चितमें सत्वर । अनुष्ठान सुलभ ॥ ३१ ॥
जैसे किया है निरूपण । वैसे ही मनका धारण ।
तभी सुक्षेत्रमें रोपणं । हुआ मानो ॥ ३२ ॥
मुझे मानकर परम । इसीलिये करके प्रेम ।
यही सर्वस्व सर्वोपम । मान लेते जो ॥ ३३ ॥
विश्वमें अजी पार्थ । वही योगी औ' भक्त ।
उत्कंठा है तदर्थ । मुझको सदा ॥ ३४ ॥
वही तीर्थ वही क्षेत्र । विश्वमें हैं वे पवित्र ।
भक्ति कथाका हैं मित्र । सदैव ही ॥ ३५ ॥
——————
जो धर्म-सार है नित्य मुझमें लीन होकर ।
सेते श्रद्धालु जो भक्त अत्यंत प्रिय है मुझे ॥ २० ॥
४२७ भक्तियोग
करता म उनका ध्यान । मेरा यह देवतार्चन ।
उस बिना माने ना मन । दूसरा भला ॥ ३६ ॥
उसका है मुझे व्यसन । मेरा वह निधि निधान ।
अथवा मेरा समाधान । उनके मिलनमें ही ॥ ३७ ॥
ऐसी प्रेमकी वार्ता । जो है अनुवादता ।
है परम देवता । हमारी वह ॥ ३८ ॥
ज्ञानदेवका सगुण कृष्ण—
जो है निज-जनानंद । तथा जगदादिकंद ।
कहता है श्री मुकुन्द । बोला संजय ॥ ३९ ॥
होता है जो निर्मल । निष्कल लोक कृपाल ।
शरणागत प्रतिपाल । शरण्य वह ॥ ४० ॥
वह है धर्म-कीर्ति धवल । अगाध-दातृत्वमें सरल ।
तथा अतुल बल प्रबल । बलि बंधन ॥ ४१ ॥
सुर-सहायशील । लोक-लालन-लील ।
प्रणत-प्रतिपाल । खेल जिसका ॥ ४२ ॥
भक्त-जन-वत्सल । प्रेमी-जन-प्रांजल ।
सत्य-केतू सरल । कला निधि ॥ ४३ ॥
वह कृष्ण वैकुंठका । चक्रवर्ति अपनोंका ।
कहता बोल प्रेमका । सुनता पार्थ ॥ ४४ ॥
संजय कहता श्रीकृष्ण । अब करेंगे निरूपण ।
कीजिये आप श्रवण । धृतराष्ट्रसे ॥ ४५ ॥
ज्ञानदेव कहता तुम । संत सेवा करना हम ।
सिखाया है महा-महिम । निवृत्तिनाथने ॥ ४६ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
१३
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
आत्म-रूपी गणेश वंदन—
आत्म-रूप गणेश स्मरण । जो सकल विद्याधिकरण ।
नमन करें वे श्रीचरण । श्रीगुरुके ॥ १ ॥
करनेसे जिसका स्मरण । शब्द-सृष्टि होती स्वाधीन ।
चढ़ता सारस्वत संपूर्ण । जिह्वा पर ॥ २ ॥
तब है वक्तृत्वकी मधुरता । हठाती अमृतकी मधुरता ।
नव-रस है चूता ही रहता । अक्षरोंसे ॥ ३ ॥
भावोंका अवतरण । स्पष्ट करता है चित्र ।
हस्तामलकसा पूर्ण । होता तत्व-भेद ॥ ४ ॥
श्रीगुरुके जब पाय । पकडता है हृदय ।
महा-भाग्यका समय । उन्मेषका वह ॥ ५ ॥
उनको करके मैं वंदन । पितामहका पिता महान ।
कहता जो श्रीलक्ष्मीरमण । कहूंगा वह ॥ ६ ॥
भगवान उवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥ १ ॥
श्रीभगवानने कहा
इस शरीरको पार्थ कहते क्षेत्र जान तू ।
जानता यह जो क्षेत्र क्षेत्रज्ञ कहते उसे ॥ १ ॥
आत्मानात्म विचार-
सुन तू अब यह पार्था । देह है क्षेत्र कहलाता ।
इसको जो सही जानता । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७ ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥ २ ॥
यहां है जो क्षेत्रका पालक । मुझको जान क्षेत्रज्ञ एक ।
बन सभी क्षेत्रका रक्षक । रहता हूं मैं ॥ ८ ॥
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञको मान । जानना है यहां ज्ञान ।
समझें हम अर्जुन । इस समय ॥ ९ ॥
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥ ३ ॥
तभी हमने है क्षेत्र कहा । किस भावसे देहको यहां ।
कहता हूं प्रयोजन सह । सुन तू पार्थ ॥ १० ॥
इसको क्षेत्र क्यों कहना । इसका पैदा कैसा होना ।
किन विकारोंसे बढ़ना । कहता हूं यही ॥ ११ ॥
यह क्या तीन अर्ध हाथका है । या इससे भी अधिक बड़ा है ।
यह बंजर है या उर्वरा है । तथा है किसका ॥ १२ ॥
इत्यादि इसके सर्व । जो जो हैं वे सभी भाव ।
कहूंगा यह अपूर्व । सुन तू सावधान हो ॥ १३ ॥
शरीरके विषयमें भिन्न भिन्न विचार-
क्षेत्रज्ञ मुझको जान बसा मैं सब क्षेत्रमें ।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञका ज्ञान उसे मैं ज्ञान मानता ॥ २ ॥
क्षेत्र क्या उसमें कैसे विकार रहते कहो ।
कैसा क्षेत्रज्ञ कौन कहवा सुन तू यह ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३०
अजी ! इसी स्थलके कारण । श्रुतिका चलता है भाषण ।
तर्ककी वाद वैखरी तीक्ष्ण । इसके लिये है ॥ १४ ॥
छाननेमें यह स्थान । थक गये हैं दर्शन ।
मिटे नहीं जो घर्षण । उनके कभी ॥ १५ ॥
अजी ! शास्त्रोंका भी नाता । इससे ही है टूटता ।
तथा इसीसे जुड़ता । झगडा जगतका ॥ १६ ॥
बातसे बात न मिलती । एक-वाक्यता नहीं होती ।
बनके वाचालता युक्ति । हुई समर्थ ॥ १७ ॥
न जाने किसका है यह स्थल । किंतु कैसी अभिलाषाका बल ।
घर घरमें है यह कपाल- । मोक्ष गाथा ॥ १८ ॥
नास्तिकोंसे करने मुठभेड़ । वेदोंने किया विद्रोह प्रचंड ।
उसको देख कर हैं पाखंड । बकवाद करते ॥ १९ ॥
कहते तुम निर्मूल । झूठा तुम्हारा वाग्जाल ।
प्रण हमारा है सबल । बीडा उठाकर ॥ २० ॥
पक्ष है जो पाखंड । नग्न लुंचित-मुंड ।
नियोजित वितंड । आते भानपे ॥ २१ ॥
मृत्यूके कसे हुए पाशमें । जायेगा यह इस भयमें ।
चले योगी-जन निर्णयमें । इस क्षेत्रके ॥ २२ ॥
मृत्यूसे हैं जो भयग्रस्त । करते वनमें एकांत ।
यम-दम-अभ्यास-रत । हो पाते पूर्ण ॥ २३ ॥
इस क्षेत्राभिमान मगन । कैलास तजता है ईशान ।
बसता है जाकर स्मशान । उलझन भयसे ॥ २४ ॥
इस प्रतिज्ञासे शंकर । सिकुडकर सभी ओर ।
करता राख घूस-खोर । मन्मथकी भी ॥ २५ ॥
तथा सत्य-लोक-नाथ । वदन चार वादार्थ ।
किंतु वे नहीं सर्वथा । जानते कुछ ॥ २६ ॥
३३१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वर द्वारा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विषयमें भिन्न भिन्न मतोंका विवेचन—
आत्मानात्म विवेक जीववादी दृष्टिसे-
एक कहता यह स्थल । जीवका ही है सहमूल ।
फिर प्राण है यह कुल । उसका यहां ॥ २७ ॥
घरमें उस प्राण के । चार भाई जो उसके ।
तथा मन-सा जिसके । प्रबंधक है ॥ २८ ॥
इन्द्रिय-बैलोंका जो समूह । नहीं देखता काल प्रवाह ।
करता है श्रम बिना आह । विषय-खेतमें ॥ २९ ॥
खोकर विहित-कर्म अवसर । अन्याय-बीजकी बुवाई कर ।
कुकर्मार्थ सब परिश्रम कर । फसल काटता ॥ ३० ॥
तभी उसीके समान । पाता है पाप जो मन ।
भोगता दुःख महान । जन्म-कोटि ॥ ३१ ॥
या विधिवत कर उद्यान । किया सत्कर्म-बीजारोपण ।
शत शत है जन्मानुदिन । सुख-भोग ॥ ३२ ॥
प्रकृतिवादियोंकी दृष्टिसे—
कहते हैं तब कुछ औ । जीवका न कहो यह ठौर ।
हमसे जानो इसका विचार । पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥
अजी ! है यहां जीव पथिक । चलती राहमें रहा रुक ।
प्राण है जो यहां मालिक । जग रहा है ॥ ३४ ॥
यहां जो अनादि प्रकृति है । सांख्य जिसके गीत गाते हैं ।
खेत यह उसकी वृत्ति है । जान तू यह ॥ ३५ ॥
गाया विविध मंत्रोंमें ऋषियोंने इसे पृथक् ।
कहा है ब्रह्म-सूत्रोंमें सप्रमाण सुनिश्चित ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३२
इसके पास है साधन । घरका ही है बारदान ।
तब बनती है किसान । अपने आप ॥ ३६ ॥
झमेलेमें नित चतुर । इसके हैं तीन कुमार ।
करते सब कारोबार । गुण हैं जो ॥ ३७ ॥
रजो-गुण बुवाई करता । सत्व जो उसको संभालता ।
तमोगुण फसल काटता । अकेला ही ॥ ३८ ॥
महत्तत्वका रच खलिहान । काल-सांडसे कराके मांडन ।
अव्यक्तका वहां ढेर महान । होता रहता है ॥ ३९ ॥
संकल्प वादियोंकी दृष्टिसे-
तब कहते कुछ बुद्धिमान । प्रकृति वादियोंसे बुरा मान ।
यह है अति आर्वाचीन । आप लोगोंका ॥ ४० ॥
अजी ! चित देकरके हो स्वस्थ । सुनो तुम यह क्षेत्र-वृत्तांत ।
तत्वमें कहां प्रकृतिकी बात । कहते हैं यह ॥ ४१ ॥
वह शून्य शय्यागृहमें । पूर्णावस्थाकी लीनतामें ।
शक्त-संकल्पने शय्यामें । निद्रा की थी ॥ ४२ ॥
जगा जो वह अकस्मात । उद्योगमें था भाग्यवंत ।
मिली है पूंजी अमानत । इच्छ-मात्रसे ॥ ४३ ॥
निराकारके उद्यानमें । त्रिभुवनकी समतामें ।
आया जो है व्यक्त रूपमें । उससे यह ॥ ४४ ॥
महा-भूतोंकी जो ऊसर । कसके उसे उर्वर ।
भूतग्रामके बांधे चार । सीमा-मेड़ें ॥ ४५ ॥
अजी ! प्रारंभ किया फिर । पंच तत्वात्मक शरीर ।
समुचित मिश्रण कर । पंच-भूतका ॥ ४६ ॥
कर्माकर्मके पत्थर । रख बांधे दोनों ओर ।
किया है अति उर्वर । ऊसर था जो ॥ ४७ ॥
आवागमनार्थ यहां फिर । जन्म मृत्युके बांधे गन्हर ।
रक्षाका ऐसा प्रबंध कर । संकल्पने तब ॥ ४८ ॥
४३३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
(55)
अहंकारसे हो एक । वह भी पूर्णायुतक ।
बुद्धिसे कार्य कृषक । कराया चराचर ॥ ४९ ॥
इस भांति है निराली । बडी संकल्पकी डाली ।
इसीलिये है वह मूली । यहां प्रपंचकी ॥ ५० ॥
ऐसे हैं यह मत-मुक्तक । व्यक्त हुए हैं जब शाब्दिक ।
जी ! आप हैं बडे विचारक । कहते हैं और ॥ ५१ ॥
स्वभाव-वादियोंकी दृष्टिसे--
अजी ! गांवमें पर-तत्वके । पर्यंकको देखें संकल्पके ।
तो क्यों प्रकृति-वादियोंके । तर्क नहीं माने ॥ ५२ ॥
किंतु ऐसा नहीं कहना । इसमें तुम्हें न पडना ।
कहा जायेगा यह पूर्ण । हमसे अब ॥ ५३ ॥
आकाश कहो है कौन । भरता मेघोंसे पूर्ण ।
अधरमें तारा-गण । कौन रखता ॥ ५४ ॥
गगनका यह वितान । किसने ताना महान ।
होता वायुका संचालन । किसकी आज्ञासे ॥ ५५ ॥
रोमोंकी बुवाई करता कौन । समुद्रको सदा भरता कौन ।
पर्जन्य धाराको गिराता कौन । कहो यहां ॥ ५६ ॥
यह क्षेत्र है ऐसा स्वाभाविक । न है कोई इसका मालक ।
पाता है जो करता देखरेख । अन्य नहीं कोई ॥ ५७ ॥
कालवादिकी दृष्टिसे--
कहता है तब और एक । तुम कहते हो बडा नेक ।
कहो कैसे भोगता है एक । केवल काल ॥ ५८ ॥
यह क्रोधी मृत्यु-सिंहका । गह्वर अपना उसका ।
नहीं क्या व्यर्थ प्रलापका । सही उत्तर ॥ ५९ ॥
सभी हैं इसकी मार । देखते हैं अनिवार ।
किंतु स्व-मतपे भार- । वे बोलते हैं ॥ ६० ॥
ज्ञा.-
नेश्वरी
४३४
महा कल्पके उस ओर । यकायक झपट्टा मार ।
प्रहार भद्र जाती पर । किया सत्य लोकके ॥ ६१ ॥
नित-नव नव लोकपाल । तथा दिग्गजोंको यह काल ।
स्वर्ग-काननमें जा विपुल । तोड़ता रहता ॥ ६२ ॥
शरीर-समीरसे इसके । गर्तमें जनम-मरणके ।
भूमिष्ठ पडे निर्जीव होके । जीव-मृग हैं ॥ ६३ ॥
फैला है इसका पंजा । मानो यह है शिंकजा ।
बनाके आकर गज- । करता है ग्रास ॥ ६४ ॥
इसीलिये कालकी सत्ता । कहते हैं हम निश्चित ।
ऐसा वाद है पांडुसुत । इस क्षेत्रका ॥ ६५ ॥
इस क्षेत्रके विषयमें सभी अज्ञानमें हैं—
कर चुका है वाद विपुल । नैमिशारण्यमें ऋषि-कुल ।
पुराण इसके अनुकूल । आधार रूप हैं ॥ ६६ ॥
हैं अनुष्टुप आदि छंद । इस विषयमें विविध ।
होते हैं आधार स-श्रध्द । आज भी लोगोंके ॥ ६७ ॥
वेदोंके बृहत्साम-सूत्र । जो हैं अतिशय पवित्र ।
उसको भी है यह क्षेत्र । अज्ञात-रूप ॥ ६८ ॥
अन्य और अगणित । महा-कवि बुद्धिमंत ।
इसपे अपना मत । देते रहते हैं ॥ ६९ ॥
किंतु यह किसका है । किसके स्वामित्वमें है ।
समझमें न आता है । किसीक भी ॥ ७० ॥
अजी ! यह है जैसे । अब क्षेत्र है कैसे ।
कहता मैं तुझसे । सुन सायन्त ॥ ७१ ॥
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ ५ ॥
पंच भूत अहंकार बुद्धि अव्यक्त मूल जो ।
एकादश इंद्रियोंको खींचे विषय पंचक ॥ ५ ॥
४३५
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ ६ ॥
इस शरीरके मूल-भूत छत्तीस तत्व—
है महा-भूत पंचक । तथा अहंकार एक ।
बुद्धि अव्यक्त दशक । इंद्रियोंका ॥ ७२ ॥
और भी है एक । विषय-दशक ।
द्वेष सुख दुःख । संघात इच्छा ॥ ७३ ॥
तथा चेतना धृति । एवं है क्षेत्र वृत्ति ।
कही तुझसे अति । अल्प-रूपसे ॥ ७४ ॥
कौन है महा भूत । विषय क्या है पार्थ ।
औ' इंद्रिय महित । कहता हूं सब ॥ ७५ ॥
पृथ्वी जल अगिन । वायु तथा गगन ।
ये हैं पांच अर्जुन । महा-भूत ॥ ७६ ॥
अहंकारका रूप—
जागृतिमें जैसे स्वप्न । आंखोंमें रहता लीन ।
या अमावासके दिन । चंद्र होता गुप्त ॥ ७७ ॥
बालकोंमें जैसे अर्जुन । छिपा रहता है यौवन ।
या कलिमें होता प्रसन्न । सुगंध गुप्त ॥ ७८ ॥
अथवा जैसे इन्धनमें । अग्नि होता सुप्तावस्थामें ।
वैसे होता है प्रकृतिमें । गुप्त-रूपसे ॥ ७९ ॥
अथवा धातु गत ज्वर । कुपध्यामिष देखकर ।
होता है अंदर बाहर । व्याप्त अर्जुन ॥ ८० ॥
ऐसे पांचोंसे मिल कर । देहका आकार लेकर ।
नचाता तब अहंकार । दश-दिशामें ॥ ८१ ॥
इच्छा द्वेष सुख-दुःख धृति संघात चेतना ।
विकार-युक्त है क्षेत्र अल्पमें तुझसे कहा ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३६
अहंकारका इक अचरज है । अज्ञानियोंको जो नहीं सताता है ।
ज्ञानियोंको ही नचाता रहता है । सिर पर चढ़के ॥ ८२ ॥
बुद्धिका लक्षण—
बुद्धिके जो लक्षण । जान ले तू अर्जुन ।
कहता है श्रीकृष्ण । यदुराज ॥ ८३ ॥
कंदर्पका ले सहाय । वृत्ति-सह जो इन्द्रिय ।
जीत लाते हैं विषय । धनुर्धर ॥ ८४ ॥
सुख दुःखके लूटका माल । जीवको अंतरंग सकल ।
दिखाता तब देता फैसला । चुनावमें योग्य ॥ ८५ ॥
यह है क्लेष या तोष । है यह गुण या दोष ।
मैला है या यह चोख । दिखाता सब ॥ ८६ ॥
अधमोत्तम जिसे सूझता । छोटा बड़ा है जो देख पाता ।
अपनी दृष्टिसे परखता । विषयोंको जो ॥ ८७ ॥
तेज तत्वका आदि । सत्व-गुणकी वृद्धि ।
आत्म-जीवकी संधि । जागृत रखता ॥ ८८ ॥
अव्यक्त प्रकृतिका रूप
जान तू यह अर्जुन । बुद्धि-तत्त्व है संपूर्ण ।
अब सुन पहचान । अव्यक्तकी ॥ ८९ ॥
जिसको है सांख्य सिद्धांत । करता प्रकृति घोषित ।
यहांपे है यही प्रस्तुत । अव्यक्त जो ॥ ९० ॥
तथा है सांख्य-योगके मतसे । प्रकृति-विचार कहा तुझसे ।
जहां प्रकृतिके दोनों रूपसे । तू है परिचित ॥ ९१ ॥
दूजी जो वहां जीव दशा । जिसका नाम है वीरेशा ।
उसे यहां अव्यक्त ऐसा । कहा गया है ॥ ९२ ॥
रजनीका होते ही अस्त । नभमें होते तारा लुप्त ।
रुकती होनेपे सूर्यास्त । भूतमात्रकी क्रिया ॥ ९३ ॥
४३७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
देह-पात पर अर्जुन । देह होती उपाधि-लीन ।
कृत-कर्ममें अनुदिन । डुबी रहती ॥ ९४ ॥
बीज-रूपमें यह सतत । रहता है वृक्ष समस्त ।
अथवा पटत्व बन सूत । रहता जैसे ॥ ९५ ॥
वैसे छोड़के स्थूल-धर्म । महा भूतोंके भूत-ग्राम ।
लय हो रहते हैं सूक्ष्म । जिस स्थानपे ॥ ९६ ॥
उसका नाम अर्जुना । अव्यक्त यह जानना ।
अब संपूर्ण सुनना । इंद्रिय-भेद ॥ ९७ ॥
इंद्रिय विवेचन ---
यहां श्रवण नयन । त्वचा औ' रसना घ्राण ।
इसको ज्ञानके जान । पांच इंद्रिय ॥ ९८ ॥
मेलेमें इन तत्वोंके । विचार सुख-दुःखके ।
करती है इंद्रियोंके- । द्वारा बुध्दि ॥ ९९ ॥
फिर वाचा और कर । पाय तथा अधोद्वार ।
तथा है जनन द्वार । पांच पार्थ ॥ १०० ॥
ये हैं कर्मेंद्रियां जान । कैवल्य-पति श्रीकृष्ण ।
कहता है तू अर्जुन । सुन ले यह ॥ १ ॥
प्राणोंको जो प्रिया होती । क्रिया-शक्ति कहलाती ।
तनमें है आती जाती । इन पांचोंसे ॥ २ ॥
ऐसे ये दश-करण । बताये तुझे अर्जुन ।
कहता हूं अब मन । रहता कैसा ॥ ३ ॥
मनका विवेचन ---
इंद्रिय-बुध्दि मध्य पर । रजोगुणका ले आधार ।
अतीव तरल होकर । रहता पार्थ ॥ ४ ॥
आकाशकी नीलिमा-सा । मृग-जल-तरंग सा ।
व्यर्थका मिथ्याभास-सा । रहता है वह ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४३८
तथा-शुक्रशोणित मिलन । देता है पंच-तत्वको चिह्न ।
एक वायु-तत्व अर्जुन । बनता दस रूप ॥ ६ ॥
फिर यह दस प्रकार । देहका सामर्थ्य लेकर ।
अपने निज स्थान पर । हुए प्रतिष्ठित ॥ ७ ॥
वहां चांचल्य चपल । रहा जो एक केवल ।
इससे रजका बल । लिया उसने ॥ ८ ॥
बुद्धिके वह बाहर । अहंताके डर पर ।
ऐसे मध्य-स्थान पर । दृढ हो बैठा ॥ ९ ॥
व्यर्थ है उसका नाम मन । जो मात्र कल्पना मूर्तिमान ।
उसके संगसे मिला जान । वस्तुको जीव भाव ॥ ११० ॥
प्रकृतिका है जो मूल । कामको जिसका बल ।
चेतता है जो प्रबल । अहंकार ॥ ११ ॥
इच्छाको वह बढ़ाता । आशाको वह चढ़ाता ।
रक्षण नित करता । भयका जो ॥ १२ ॥
द्वैतका जो उगम-स्थान । अविद्या करे बलवान ।
इन्द्रियोंका करे पतन । विषयोंमें ॥ १३ ॥
संकल्पोंसे है सृष्टि रचता । विकल्पोंसे उसको तोड़ता ।
मनोरथोंका ढेर चढा था- । उतराता वह ॥ १४ ॥
भ्रांतिका जो भंडार । वायु तत्व्-अंतर ।
तथा बुद्धिका द्वार । करता बंद ॥ १५ ॥
यह कहलाता मन । अन्य कछु नहीं जान ।
अब विषयाभिदान । बताता हूं ॥ १६ ॥
विषयोंका स्पष्टीकरण-
स्पर्श तथा शब्द । रूप रस गंध ।
हैं ये पंच-विध । ज्ञानेंद्रियोंके ॥ १७ ॥
४३९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इन द्वारोंसे निरंतर । दौड़ता है ज्ञान बाहर ।
भ्रांत हो जैसा जानवर । हरा चारा देख ॥ १८ ॥
फिर स्वर वर्ण विसर्ग । अथवा स्वीकार औ' त्याग ।
तथा संक्रमण उत्सर्ग । विण्मूत्रोंका ॥ १९ ॥
कर्मेंद्रियोंके पांच । विषय हैं ये सच ।
बांध करके माच । चलती क्रिया ॥ १२० ॥
ऐसे दस बसे हैं । देहमें विषय हैं ।
इच्छा जो कहाती है । कहते अब ॥ २१ ॥
इच्छाका स्वरूप तथा द्वेष—
गत भोग जब है स्मरता । या ऐसा शब्द कानपे आता ।
तो कानपे हाथ रख जाता । न तो वृत्ति-जगती ॥ २२ ॥
विषयेंद्रिय भेंट होती । तभी वह जाग उठती ।
कामका हाथ धर वृत्ति । उठती जो ॥ २३ ॥
अजी ! उठनेसे यह वृत्ति । मनकी होती तीव्र-गति ।
जहां नहीं जाना वहां जाती । ललचाकर इन्द्रियां ॥ २४ ॥
जिस प्रवृत्तिके लोभसे । बुद्धि हो पगलाई जैसे ।
इन्द्रियां लुब्ध हो उससे । वह है इच्छा ॥ २५ ॥
इन्द्रियोंका जो इच्छित विषय । नहीं पाती वे जब धनंजय
तब अनुभवती जो इन्द्रिय । वह है द्वेष ॥ २६ ॥
सुख दुःखका स्वरूप—
कहता हूं अब सुख । वह ऐसा है तू देख ।
जिस एकसे अशेष । भूले सब जीव ॥ २७ ॥
अजी ! तन मन वचन । अपनी सौगंधसे जान ।
देह-स्तुतिको बल-हीन । करते आता ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४४०