सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ—
अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर ।
उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥
वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे ।
कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥
वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता ।
अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥
वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र ।
लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥
जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें ।
उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥
भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं ।
यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥
इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण ।
जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥
मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत ।
इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥
ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ ।
जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥
प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर ।
पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥
रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् ।
बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥
४१३ भक्तियोग