ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते ।
आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥
नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर ।
भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥
साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन ।
विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥
संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन ।
लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥
पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य ।
भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥
मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो—
श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ ।
श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥
त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर ।
लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥
मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें ।
वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥
इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि ।
कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥
वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द ।
अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ।
विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे ।
कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०६