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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 481

सकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त ।
उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥
उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध ।
तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥
काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात ।
तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥
प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना ।
दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥
सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना ।
वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥
शीतको बिछाना । तापको ओढना ।
घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥
अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया ।
आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥
न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज ।
किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥
ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण ।
पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥
योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ ।
दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥
अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने ।
पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥
बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार ।
ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥
बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर ।
सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥
४११ भक्तियोग