ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती ।
जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥
वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त ।
रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥
तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा ।
तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥
मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त ।
भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० ।
उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति ।
नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥
ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त ।
तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥
सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार ।
सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥
वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार ।
तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥
फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण ।
तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥
मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित ।
मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥
दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल ।
उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥
मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ ।
असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥
४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग