ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे ।
प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश ।
जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥
किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा ।
तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥
भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि—
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥
कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष ।
प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥
विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना ।
अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥
इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन ।
ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥
दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव ।
मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥
ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर ।
जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥
उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व ।
योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥
ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग ।
उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥
किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण ।
अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१२