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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 477

ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग—
तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज ।
बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥
कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन ।
भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥
कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार ।
श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥
अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत ।
भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥
अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित ।
द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥
कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका ।
इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥
जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी ।
करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥
इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?—
बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित ।
जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक ।
यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥
तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम ।
भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥
तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति ।
दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥
तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर ।
उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥
४०७ भक्तियोग