सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

विषयोंमें वैसा कुछ सुख है । कहने जैसा भी कुछ नहीं है ।
विद्युल्लतासे जैसे न होता है । प्रकाश जगतमें ॥ १३ ॥
बात वर्षा आतपमें यदि साया । करती है घने बादलकी काया ।
व्यर्थ है तब बांधना धनंजय । महलादिक ॥ १४ ॥
विषयोंको सुख कहना । व्यर्थकी बात है कहना ।
विषकंदको ही कहना । जैसा अति-मधुर ॥ १५ ॥
कहते जैसे भूमिपुत्रको मंगल । अथवा मृगजलको कहते जल ।
विषयानुभव कहलाता गरल । वैसे ही व्यर्थ ॥ १६ ॥
जाने वे पार्थ सब ये बोल । सर्प फनकी साया शीतल ।
होगी कह कहाँ तक निश्चल । मूशकको ॥ १७॥
आमिष ग्रास जैसा अर्जुन । न खाये तब तक भला मीन ।
वैसा विषय संग संपूर्ण । जान तू निश्चित ॥ १८ ॥
विरक्तियोंकी जो दृष्टि । देखती इसे किरीटी ।
पांडुरोगकी है पुष्टि । वैसे ही ॥ १९॥
तभी विषय भोगमें सुख । जानो है वह साद्यंत ही दुःख ।
किंतु क्या करेंगे जन मूर्ख । भोगके न थकते ॥ १२० ॥
न जानते अंतरंग बेचारे । इसीलिये सब सेवन करे ।
कहो पूय 'पंकके है जो कीरे । क्या करेंगे घृणा ॥ २१ ॥
दुख ही उन दुखितोंका घर । है विषय कर्दम ही दुर्दर ।
भोग-जल जलके जलचर । छोड़ें कैसे ॥ २२ ॥
और जो ये दुःख योनी हैं । सब निरर्थक होती हैं ।
यदि जीव सब विरत हैं । विषयोंमें ॥ २३ ॥
वैसे ही गर्भवासका कष्ट । या जन्म-मरणादि संकट ।
• अविश्रांत रूप यह बाट । चलेगा कौन ॥ २४ ॥
विषयी यदि विषय छोड़ेंगे । महादोष ये जो कहाँ रहेंगे ।
संसारादि नाम ये व्यर्थ होंगे । इस जगतके ॥ २५ ॥
तभी किया सुख बुद्धिसे स्वीकार । विषय सुखका है जीवन भर ।
कर दिखाया मिथ्याको सच कर । अविद्याजात ॥ २६ ॥
१४५ कर्म-संन्यासयोग
(19)

सुन अर्जुन इस कारणसे । विष है विषय विचारनेसे ।
नहीं जा तू कभी इस राहसे । भूल कर भी ॥ २७ ॥
इससे ये विरक्त पुरुष । त्यजते हैं जैसे मान विष ।
न भाता उन्हे सुख रूप दुःख । विषयोंका कभी ॥ २८ ॥
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥ २३ ॥
बात नहीं ज्ञानियोंमें । विषयकी सपनेमें ।
देह भावको देहमें । मिटाया है ॥ २९ ॥
सदा जिसका अंतःकरण । अनुभवता सुख महान ।
न जाने अन्य कछु अर्जुन । विषयादिक ॥ १३० ॥
वे हैं भोगते द्वैत भावसे । पक्षीके फल चुगने जैसे ।
यहां संपूर्ण विसर्जनसे । भोक्ता भावके ॥ ३१ ॥
भोगमें ऐसी अवस्था आती । अहंताका परदा हटाती ।
महासुखालिंगन कराती । ऐक्य भावका ॥ ३२ ॥
उस आलिंगनके समय । जलमें होता जलका लय ।
मिट जाता है वैसा उभय । न दीखता भेद ॥ ३३ ॥
या आकाशमें खो जाता वात । मिटती वह "दो" ऐसी बात ।
रहता सुख मात्र शाश्वत । भोगमें वहाँ ॥ ३४ ॥
द्वैतकी भाषा मिटती है जहाँ । रहता है फिर ऐक्य ही वहाँ ।
रहता फिर साक्षी कौन कहाँ । जानता जो ॥ ३५ ॥
योऽन्तः सुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥ २४ ॥
यलसे मृत्युके पूर्व देहमें जो पचा सका ।
काम क्रोधादिके वही योगी वही सुखी ॥ २३ ॥
प्रकाश स्थिरता सौख्य मिला अंतरमें जिन्हे ।
ब्रह्म ही बनके योगी पाता निर्वाण ब्रह्ममें ॥ २४ ॥
ज्ञानेश्वरी १४६

लभंते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥ २५ ॥
इसीलिये जाने दो संपूर्ण । न बोलने जैसा बोले कौन ।
जानेगा सहज ज्ञानी चिह्न । आत्माराम ॥ ३६ ॥
जो हैं ऐसे सुखमें मगन । अपनेमें हैं आप अर्जुन ।
वे ढली हुई मूर्ति समान । समरसकी ॥ ३७ ॥
हैं वे आनंदके अनुकोर । महासुखके हैं जो अंकुर ।
या महाबोधके हैं विहार । बने जो ॥ ३८ ॥
वे हैं विवेकके गांव । परब्रह्मका स्वभाव ।
या सजे हैं अवयव । ब्रह्मविद्याके ॥ ३९ ॥
वे हैं सत्वके सात्विक । या चैतन्यके आंगिक ।
क्यों कर ये एक एक । बखानना है ॥ १४० ॥
विषय विस्तारकेलिये श्रीनिवृत्तिका उलाहना—
जब तू संत स्तवन रचता । कथाका विचार नहीं करता ।
विषयांतर कर तू बोलता । सनागर ॥ ४१ ॥
कर तू रसातिरेक संकुचित । ग्रंथार्थ दीप कर-प्रज्वलित ।
साधु हृदय मंदिर कर प्रभात । मंगलकारक ॥ ४२ ॥
ऐसा गुरुका अव्हाइन । निवृत्तिके दासने सुन ।
कहता श्रीकृष्ण-वचन । वही सुनो ॥ ४३ ॥
जिसने अनंत सुखका सागर । तलका लिया है सुदृढ आधार ।
वह तद्रूप होकर वहीं स्थिर । हुए हैं पार्थ ॥ ४४ ॥
विशुद्ध आत्म प्रकाशमें । विश्व देखता अपनेमें ।
वह है ब्रह्म रूप तनमें । मानना निश्चित ॥ ४५ ॥
पाते हैं ब्रह्म-निर्वाण होते हैं क्षीण-पाप जो ।
असंशयी ऋषी ज्ञानी जो विश्व हितमें रत ॥ २५ ॥
१४७ कर्म-संन्यासयोग

सत्याकार वह परम । अक्षर है वह निःसीम ।
उस गांवके है निष्काम । अधिकारी जो ॥ ४६ ॥
महर्षियोंका जहाँ अधिकार । विरक्तोंका है अंश सुंदर ।
संशय रहितोंका निरंतर । फलरूप वह ॥ ४७ ॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ॥ २६ ॥
मानवके निःसीम स्थितिका विवेचन—
विषयोंसे जिन्होंने खींचलिया । अपना चित्त आपही जीत लिया ।
निश्चित ही वहां लीन किया । सदैवही ॥ ४८ ॥
वह है परब्रह्म निर्वाण । आत्मज्ञानके ही कारण ।
उन्हींको तू पुरुष है जान । धनंजय ॥ ४९ ॥
वैसे वे कैसे हुए । देहमें ब्रह्मत्व पाए ।
संक्षेपमें हरि कहे । अर्जुनसे ॥ १५० ॥
स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
प्राणापानौ समौकृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ २७ ॥
वैराग्यका सहारा ले करके । तजे विषय अंतःकरणके ।
अंतर्मुख किये वेग मनके । शरीरमें ही ॥ ५१ ॥
सहज होती त्रिवेणीकी भेंट । पड़ती जहां भ्रूमध्यमें गांठ ।
वहां स्थिर करके जो दीठ । फेरते हैं ॥ ५२ ॥
छोडकर दक्षिण बाम । प्राणापान करके सम ।
चित्तको करने व्योम । मार्गी पार्थ ॥ ५३ ॥
जीतते काम औ' क्रोध यलसे चित्त रोधके ।
देखते ब्रह्म-निर्वाण ब्रह्मज्ञ सब ओरसे ॥ २६ ॥
विषयोंका बहिष्कार दृष्टि भ्रूमध्यमें स्थिर ।
नाकसे चलते श्वास प्राणापान करे सम ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी १४८

यतेन्द्रियमनो बुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ॥ २८ ॥
जैसे मार्गादिकका सकल । पानी ले गंगा सागर तल ।
जाके चुनती क्या भिन्न जल । एकेक करके ॥ ५४ ॥
वैसे वासनांतरकी विवंचना । अपने आप मिटती अर्जुन ।
गगनमें जब लय होता मन । प्राणायामसे ॥ ५५ ॥
संसार चित्र जहाँ पड़ता । वह मन पट है फटता ।
सरोवर जब है सूखता । तब नहीं प्रतिबिंब ॥ ५६ ॥
मिटता जब मूलसे मनत्व । रहता वहाँ अहंकार तत्व ।
तभी शरीरमें जो ब्रह्मत्व । अनुभवना ॥ ५७ ॥
भोक्तारं यज्ञ तपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शांतिमृच्छति ॥ २९ ॥
हमने जो अभी कहे हुए । देहमें ही जो ब्रह्मत्व पाए ।
सब वे इसी मार्गसे आए । इसीलिए ॥ ५८ ॥
यम नियमोंके डोंगर । तथा अभ्यासके सागर ।
अतिक्रमण कर पार । आये सब ॥ ५९ ॥
अपनेको कर निर्लेप । लेकर प्रपंचका नाप ।
हो गये सत्यका ही रुप । जीवनमें ॥ ६० ॥
योग-युक्तका यह उद्देश । बोला वह हृषीकेश ।
सुनकर अर्जुन सुदंश । हुआ चकित ॥ ६१ ॥
जाना कृष्णने यह देखकर । बोले तब पार्थसे हंसकर ।
हुआ न तेरा चित्त सुनकर । प्रसन्न अब ॥ ६२ ॥
जीतके मन प्रज्ञाको मुनि मोक्ष परायण ।
तजे इच्छा भय क्रोध सदा-सर्वत्र मुक्त है ॥ २८ ॥
भोक्ता तप यज्ञका मैं मित्र हूँ विश्व-चालक ।
मुझको मानके ऐसा पाता है शांति-शाश्वत ॥ २९ ॥
१४९ कर्म-संन्यासयोग

अगले अध्यायकी भूमिका रूप योग-मार्ग-दर्शन-
अर्जुन कहता तब देव । पर चित्त लक्षणका ठाव ।
जान लिया तूने भला भाव । मनका मेरा ॥ ६३ ॥
स विवरण मेरा जो पूछना । देव ! उसीको पहले कहना ।
कहा जो उसीको फिर कहना । स्पष्ट रूपसे ॥ ६४ ॥
वैसे तेरे कहनेके अनुसार । पगदंडीसी है यह पानी पर ।
ऐसा सरल पथ जो शांगंधर । कहा अब ॥ ६५ ॥
सांख्यसे है यह सरल । हम जैसोंको जो दुर्बल ।
समझनेमें कुछ काल । सहना पडे ॥ ६६ ॥
इसीलिये मधुसूदन । मेरा है यह निवेदन ।
इसीका सविस्तर कथन । करना साद्यंत ॥ ६७ ॥
श्रीकृष्ण कहते हैं ऐसा । तुझे लगा यह भलासा ।
कहता हूँ सुखसे वैसा । सुनो अब ॥ ६८ ॥
अर्जुन तू यदि सुनेगा । सुनकर वैसा चलेगा ।
तब कहनेमें करूंगा । क्यों संकोच ॥ ६९ ॥
चित्त है जो पहले ही माताका । निमित्त है वहां मन-मानेका ।
अब उस अद्भुत स्नेहका । करना ही क्या ॥ १७० ॥
कहना उसे कारुण्यकी वृष्टि । अथवा स्नेहकी नूतन सृष्टि ।
या वह थी हरिकी अनुग्रह दृष्टि । हरिही कहें ॥ ७१ ॥
वह थी क्या अमृतसे है ढली । या प्रेम रससे मस्त थी भली ।
पार्थ प्रेममें उल्झी पहली । जो छूटे ही ना ॥ ७२ ॥
करना इसका जितना वर्णन । टूटेगा उतना कथाका संधान ।
किंतु न होगा प्रभु स्नेहका ज्ञान । शब्दसे कभी ॥ ७३ ॥
इसमें है क्या आश्चर्य महान । नहीं जिसे अपना ही ज्ञान ।
करेगा कैसे वह आकलन । ईश्वरका भला ॥ ७४ ॥
अबतककी कृष्णवाणीकी ध्वनिसे । लगता पार्थ प्रेममें उलझनेसे ।
हरि कहता है मानों बलात्कारसे । सुनो बाबा ॥ ७५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५०

जिससे तेरा अर्जुन । चित्त करे आकलन ।
वैसे करूं निरूपण । विनोदसे ॥ ७६ ॥
नाम अब जिसका योग । उसका क्या है उपयोग ।
तथा अधिकार प्रसंग । कहूँगा तुझे ॥ ७७ ॥
ऐसा जो जो कुछ है । अब तक जो कहा है ।
वह सारा तुझसे है । कहूँगा अभी ॥ ७८ ॥
अब तू चित्त देकर । कथा सुन धनुर्धर ।
ऐसा कहता श्रीधर । अर्जुनसे ॥ ७९ ॥
श्रीकृष्ण अर्जुनके संग । न छोड़के कहेगा योग ।
व्यक्त करूं वह प्रसंग । कहता निवृत्ति दास ॥ १८० ॥
गीता श्लोक २९
ज्ञानेश्वरी ओवी १८०.
ॐ

६
आत्म-संयमयोग
छठे अध्यायकी भूमिका—
राजासे कहता संजय । सुनिये अब अभिप्राय ।
श्रीकृष्ण कहता है वाक्य । योग-रूप ॥ १ ॥
ब्रह्म-रसका सहज पारण । देता अर्जुनको श्रीनारायण ।
अतिथिरूप पहुँचे उसी क्षण । हम भी वहाँ ॥ २ ॥
न जाने देवकी महत्ता । तृषित जब पानी पीता ।
तब स्वाद लेके देखता । अमृत है यह ॥ ३ ॥
ऐसे हमें तुम्हें हुआ है । अनायास तत्व मिला है ।
किंतु धृतराष्ट्र बोला है । यह न पूछा हमने ॥ ४ ॥
इस बोलसे तब संजय । समझा है राजाका हृदय ।
हुआ है इन्हें मोह संचय । स्व कुमारोंका ॥ ५ ॥
सोचकर वह हँसा मनमें । बुद्धि नासी है बूढेकी मोहमें ।
योग जो अमृतोपम क्षणमें । चला है अब ॥ ६ ॥
किंतु इन्हें यह कैसा भायेगा । जन्मांध भला कैसा देखेगा ।
यह सब इन्हें कौन कहेगा । सोचता संजय ॥ ७ ॥
होकर वह प्रमुदित । देकर अपना सुचित्त ।
श्रवण की हुई जो बात । नरनारायणमें ॥ ८ ॥
अमृतानंदकी उस तृप्तिसे । साभिप्राय अंतःकरणसे ।
कहेगा वह अत्यादरसे । धृतराष्ट्रको ॥ ९ ॥

गीतामें वह षष्ठीका । प्रसंग है चातुर्यका ।
समुद्रार्णवमें अमृतका । उदय जैसा ॥ १० ॥
वैसा गीतार्थका है सार । विवेक सिंधुका है पार ।
योग-वैभवका भांडार । खुला है जो ॥ ११ ॥
आदि प्रकृतिका जो विश्रांतिस्थान । हुए हैं जहां शब्द-ब्रह्म भी मौन ।
अंकुरित हो फैला है गीता ज्ञान । वहांसे ही ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरका देश-भाषा प्रेम—
अध्याय है यह छठा । साहित्यमें अनूठा ।
कहता मैं सुन सुभटा । चित्त देकर ॥ १३ ॥
मेरी देशीके बोल सुंदर । वे हैं अमृतसे भी मधुर ।
ऐसे सरस सरल अक्षर । जोडूंगा मैं ॥ १४ ॥
जो हैं कोमलसे अति कोमल । सप्त स्वर नादसे भी विमल ।
टूटेगा परिमलका भी बल । इन शब्दोंसे ॥ १५ ॥
इसकी सरसताका लोभ । बनायेगा कानको भी जीभ ।
होगा इंद्रिय कलहारंभ । इसे सुननेमें ॥ १६ ॥
विषय है शब्द सुनना श्रवणका । जीभ कहेगी मेरा विषय रसनाका ।
घ्राण कहेगा भाव है परिमलका । यही होगा ॥ १७ ॥
कौतुक करेंगी काव्य रसका । देख कर आंखें शब्द चित्रका ।
कहेंगी खुला है रूप-कोशका । सु-प्रदर्शन ॥ १८ ॥
संपूर्ण पद आता जहां उभर । मन दौड़ आता है वहां बाहर ।
आगे उठ आयेंगे दोनों कर । आलिंगन करने ॥ १९ ॥
अजी ! इंद्रियां ऐसे अपने भावमें । लड़ेंगी अपनेमें रसिक-पनमें ।
जैसा अकेला प्रकाशता जगतमें । सहस्रकर ॥ २० ॥
शब्दोंकी है ऐसी ही व्यापकता । जानो उसकी असाधारणता ।
भावज्ञोंको अर्थकी व्यापकता । चिंतामणिकी ॥ २१ ॥
(20) १५३ आत्म-संयमयोग

निष्काम भावसे दिये गये शब्द-भोजनका आनंद—
ऐसा है सरस शब्द भोजन । परोसा कैवल्य रसमें सान ।
किया है मैंने यह संतर्पण । निष्काम भावसे ॥ २२ ॥
अजी ! आत्म प्रकाश नित्य नया । उसको ही बना करके दिया ।
इंद्रियोंसे चुरा करके खाया । जिसने पाया वह ॥ २३ ॥
श्रवणेंद्रियोंको जिस भोजमें । बिठाना पड़ता है पंगतमें ।
खाना है अंतर्मुख हो मनमें । यह अमृतान्न ॥ २४ ॥
खोलना यहां शब्दका आच्छादन । करना अर्थ ब्रह्मका आस्वादन ।
होना फिर सुख समरसैक्य जान । सुख रूप होके ॥ २५ ॥
आयेगा जब चितमें कोमलपन । होगा तब सफल यह निरूपण ।
न तो होगा यह वाचा विहार मान । गूंगे बहरोंका ॥ २६ ॥
अजी ! जाने दो यह सब । श्रोताका चुनाव क्यों अब ।
वे सब अधिकारी अब । जो हैं निष्काम काम ॥ २७ ॥
जिनका आत्म-बोधका प्यार । करे स्वर्ग-संसार न्योच्छावर ।
न जाने अन्य माधुर्य अमर । यहांका जी ॥ २८ ॥
काक जैसे चांदनी न जानता । विषयासक्त “तत्व” न जानता ।
वैसे सदा चंद्रकिरण खाता । चकोर पक्षी ॥ २९ ॥
वैसे ज्ञानियोंका है यही आधार । अज्ञानियोंको उसमें नहीं सार ।
इसमें नहीं बोलना कछु और । रहा अधिक ॥ ३० ॥
प्रसंग आया तब कहे यह वचन । क्षमा करेंगे सभी संत सज्जन ।
कहूंगा अब मैं वह निरूपण । श्रीरंगका कहा ॥ ३१ ॥
श्री गुरुको वंदन—
आता नहीं वह बुद्धिके बोधमें । नहीं आता है शब्दके परिघमें ।
निवृत्ति-कृपाके दीप-प्रकाशमें । देखूंगा मैं ॥ ३२ ॥
दृष्टिसे जो देखा नहीं जाता । दृष्टि बिन ही वह दीखता ।
ज्ञान बल जब प्राप्त होता । अतींद्रिय जो ॥ ३३ ॥
ज्ञानेश्वरी १५४

धातुवादसे जो न मिलता । लोहेमें ही वह प्राप्त होता ।
पारस यदि हाथमें आता । दैवयोगसे ॥ ३४ ॥
सद्गुरुकी जब कृपा होती है । सभी बात तब संभव होती है ।
हम पर वह कृपा अपार है । कहता ज्ञानदेव ॥ ३५ ॥
इस कृपा प्रभावसे मैं बोलूंगा । शब्दमें अरूप रूप दिखाऊंगा ।
अतींद्रियकी प्रतीति कराऊंगा । इंद्रियोंसे ॥ ३६ ॥
सुनो यश श्री औदार्य । ज्ञान वैराग्य ऐश्वर्य ।
ये जो छे गुणवर्य । रहते जहां ॥ ३७ ॥
वही है जो भगवंत । रहता निसंगके साथ ।
कहे पार्थ दत्त-चित्त । होकर सुन तू ॥ ३८ ॥
भगवान उवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥ १ ॥
एक ही स्थान पर पहुंचनेवाले दो मार्ग—
योगी तथा संन्यासी जगतमें । एक है, भिन्न माने तू मनमें ।
देखें जब दोनों विचारांतमें । एक ही है ॥ ३९ ॥
छोड दो , दो नामका आभास । वही योगी औ' वही संन्यास ।
जैसे ब्रह्ममें ना अवकाश । वैसे दोनोंमें देख ॥ ४० ॥
अजी ! भिन्न भिन्न नामसे हैं जैसे । बुलाते एक ही पुरुषको वैसे ।
अथवा जाते हैं दो भिन्न मार्गसे । एक ही स्थान ॥ ४१ ॥
अथवा जैसे उदक मात्र एक । भिन्न घटमें भरनेसे अनेक ।
वैसे हैं योगी संन्यास विषयक । भिन्न भिन्नत्व ॥ ४२ ॥
श्री भगवानने कहा
फलका आसरा छोड करे कर्तव्य कर्म जो ।
संन्यासी या वही योगी न जो निर्यज्ञ निष्क्रिय ॥ १ ॥
१५५ आत्म-संयमयोग

विश्वमें जो सकल समस्त । योगी है वह सुन तू पार्थ ।
कर्म करके भी जो आसक्त । फलमें नहीं होता ॥ ४३ ॥
भूमि जैसे उपजाती उद्बीज । बिना अहंभावके ही सहज ।
न करती कभी उसके बीज । अपेक्षा वह ॥ ४४ ॥
वैसे है कुल-धर्मका आधार । वर्ण धर्मानुसार है आचार ।
करता जो यहां स-अवसर । वही सभी ॥ ४५ ॥
करता रहता है उचित । किंतु कर्तव्य-भाव रहित ।
तथा फल विन्मुख हो चित । अन्तःकरणसे ॥ ४६ ॥
सुन तू अर्जुन मेरी बात । रहता ऐसा संन्यासी नित ।
मानो उस विश्वाससे नित । योगीश्वर ॥ ४७ ॥
तथा उचित कर्म प्रासंगिक । छोडते उसे कहके बहूक ।
किंतु तुरंत दूसरा ही एक । करते प्रारंभ ॥ ४८ ॥
जैसे एक लेप धोकर । लगाते दूसरा तन पर ।
वैसे आग्रहसे निरंतर । कष्टमें पडते ॥ ४९ ॥
अजी ! गृहस्थाश्रमका बोझ । आया जो सिरपर सहज ।
वहां संन्यासका रख साज । चलते आगे ॥ ५० ॥
तभी वे अग्नि सेवाको नहीं छोड़ते । कर्म-रेखाका उल्लंघन न करते ।
योग-सुखको हैं अनुभव करते । सहज भावसे ॥ ५१ ॥
उच्च स्थितिकी प्राप्तिकेलिये अष्टांग योगकी सीढ़ियां—
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव ।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥
योगी जो है वही संन्यासी । विश्वमें एक-वाक्यता-सी ।
ध्वज गाड़के कही जैसी । शास्त्रोंने सभी ॥ ५२ ॥
संन्यास जो कहा जाता उसीको योग जान तू ।
योगी होता नहीं कोयी बिना संकल्प त्यागके ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी १५६

जहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता ।
अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर ।
कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥
यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे ।
प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥
टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका ।
टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥
वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे ।
चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥
पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे ।
ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥
फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ ।
होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥
रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति ।
इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥
इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ ।
हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥
यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा ।
योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥
न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है ।
संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥
१५७ आत्म-संयमयोग

इंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य—
अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके ।
तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥
आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके ।
स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥
इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें ।
फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥
देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार ।
जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥
अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित ।
कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है —
स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना ।
किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥
अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर ।
शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥
होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात ।
आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥
इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन ।
चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥
उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी ।
आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५८

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥
ऐसा सोचके अहम्‌को त्यागना । फिर वस्तुका दर्शन करना ।
इससे होगा कल्याण अपना । आपने किया ऐसा ॥ ७१ ॥
नहीं तो कोशकीटक जैसे । बने अपना वैरी आप जैसे ।
तन पर आत्म-भाव रखनेसे । बनते हैं नित ॥ ७२ ॥
प्राप्ति वेलामें दैव हीनकी । चाह होती है अंधत्वकी ।
तथा अपनी ही आंखोकी । मिटती दृष्टि ॥ ७३ ॥
कभी कोई कहता भ्रमसे । यह मैं नहीं चुराया ऐसे ।
अंतःकरणमें फंसे फंदसे । अपनी कल्पनाके ॥ ७४ ॥
देखें तो वह पहले जैसा । किंतु न जानती बुद्धि ऐसा ।
स्वप्नके घावसे कोई जैसा । मरता नहीं ॥ ७५ ॥
अंग भारसे झुकके जैसे । नलिका घूमती उलटके ।
शुक बैठे उसे पकडके । न उडता शंकासे ॥ ७६ ॥
व्यर्थ ही चहूं ओर देखता । संकोचसे नली पकडता ।
वही कसकर पकड़ता । पैरोंसे शुक ॥ ७७ ॥
अपनेको बंधनमें मानकर । भावनासे स्वयं जकड़कर ।
पैरोंसे पकड़ता है कसकर । मुक्त होकर भी ॥ ७८ ॥
कारणके बिन जकड़ा हुआ । किसीसे क्या वह बंधा हुआ ।
खींचने पर भी पकड़ा हुआ । रहता सतत ॥ ७९ ॥
ऐसा रिपु है अपने आप । जिसने बढ़ाये हैं संकल्प ।
न लेता मिथ्याभिमान आप । वह है बंधु अपना ॥ ८० ॥
जीतता अपने आप आपही अपना सखा ।
छोडा यदि उसे स्वैर अपना शत्रु है बना ॥ ६ ॥
१५९ आत्म-संयमयोग

जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥
आत्मज्ञका वर्णन —
उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत ।
परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥
जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस ।
वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥
घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे ।
जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥
नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका ।
वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥
शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव ।
मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥
जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर ।
जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥
मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर ।
वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥
जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव ।
फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥
हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल ।
शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥
ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके ।
देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ ।
ज्ञानेश्वरी १९०

मैं अमर्याद या मर्यादित । इसकी चर्चा भी हुई व्यर्थ
अनुभवमें न आता द्वैत । इसीलिये ॥ ८९ ॥
शरीर है किंतु कौतुक । परब्रह्म-धाम है नेक ।
जिन्होंने जीत लिया देख । इंद्रियोंको ॥ ९० ॥
जो है जितेंद्रिय सहज । वही योग-युक्त समझ ।
वहां छोटे मोटेका दूज । कभी नहीं ॥ ९१ ॥
सोनेका मेरु पर्वत । माटीका ढेर या पात ।
मानता समान नित । समदृष्टिसे ॥ ९२ ॥
पृथ्वीके मोलका प्रसिद्ध । रत्न पाता जो शुद्ध ।
तथा पत्थर भी असिद्ध । एक जैसा ॥ ९३ ॥
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु ।
साधुष्वपिच पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९
सुहृद और शत्रु । उदास और मित्र ।
भेदाभेद विचित्र । कल्पना नहीं ॥ ९४ ॥
या बंधु है कौन उसका । द्वेष करे कौन किसका ।
मैं हूँ विश्व ऐसा जिसका । हुआ अनुभव ॥ ९५ ॥
कहो कैसे फिर उसकी दृष्टि । जाने अधम उत्तम किरीटी ।
दिखाये कैसे पारस कसौटी । सोना औ' लोहकी ॥ ९६ ॥
विवर्णको सुवर्ण करता पारस । वैसे चराचरसे होता समरस ।
बुद्धिमें समता रहती है सरस । निरंतर उसकी ॥ ९७ ॥
विश्वालंकारके प्रकार । अनेक रूपके आकार ।
मूलमें स्वर्ण है धनुर्धर । परब्रह्म रूप ॥ ९८ ॥
प्राप्त जिसे ऐसा उत्तम ज्ञान । नाना प्रकार देख असमान ।
नहीं फंसता वह बुद्धिमान । आकार-जालमें ॥ ९९ ॥
शत्रु मित्र उदासीन मध्यस्थ आप्त औ' पर ।
साधु या पातकीमें भी सम-बुद्धि विशिष्ट सो ॥ ९ ॥
१६१ आत्मसंयम योग
(21)

डालनेसे वस्त्रपर दृष्टि । दीखती सभी सूतकी सृष्टि ।
वहां है नहीं दूसरी गोष्टि । सूतके बिना ॥ १०० ॥
ऐसा प्रतीत जो है करता । अनुभव ऐसा जहां होता ।
वही समबुद्धि कहलाता । नहीं अन्य ॥ १ ॥
होता है वह तीर्थ-राज समान । उसके दर्शनसे हो समाधान ।
होता संगसे ब्रह्मभावका ज्ञान । अनिच्छुको भी ॥ २ ॥
धर्मका सारथ्य करती है उसकी गोष्टि । महा-सिद्धिको जन्म देती उसकी दृष्टि ।
स्वर्गादि सुखकी करना है नव-सृष्टि । खेल है उसको ॥ ३ ॥
यदि कोई सहज स्मरता । देते हैं वे अपनी योग्यता ।
उनकी प्रशंसा स्वभावता । देती शुभ-लाभ ॥ ४ ॥
योगी युञ्जीत सततम् आत्मानं रहसि स्थितः ।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥
कभी अस्त न होगा ऐसे । देखा अद्वैत दिवससे ।
आप रहता है अपनेसे । अखंडित ॥ ५ ॥
इस दृष्टिसे वह विवेकी है । अर्जुन जो एकाकी रहता है ।
त्रिभुवनमें वही होनेसे है । सहज अपरिग्रही ॥ ६ ॥
ऐसे हैं जो असाधारण । प्राप्त पुरुषके लक्षण ।
सर्वज्ञताके ही कारण । श्री कृष्ण कहता ॥ ७ ॥
यह है ज्ञानियोंका बाप । सबकी दृष्टिका है दीप ।
उसका समर्थ संकल्प । रचता विश्वको ॥ ८ ॥
हाटमें है जो प्रणवके । वस्त्र बना शब्द-ब्रह्मके ।
लपेट न सका उसके । यशसे छोटा बड़ा ॥ ९ ॥
उसकी है अंगकी कांतिसे । प्रकाशते रवि-शशि ऐसे ।
विश्व क्या उसके प्रकाशसे । ओझल है पार्थ ॥ ११० ॥

इच्छा संग्रहको छोड़ चित्तको करके वश ।
आत्मामें ही सदा लीन रहा एकांत भावसे ॥ १० ॥
ज्ञानेश्वरी १६२

जिसके नामके ही सम्मुख । आकाश लगता बौना देख ।
उसका गुण तू एक एक । कैसा जानेगा ? ॥ ११ ॥
इसीलिये ऐसा वर्णन । न जाने किसके लक्षण ।
कहनेके बहाने मान । कहे हैं यहां ॥ १२ ॥
श्रीकृष्णका भक्त प्रेम --
सुनोजी द्वैतका म्यान मान । नष्ट करता है ब्रह्म-ज्ञान ।
उससे सख्य माधुरी जान । नष्ट होगी ॥ १३ ॥
इसीलिये हरिका यह बोलना । मानो हलकासा परदा रखना ।
मनके सख्य सुखको हे भोगना । द्वैत भावसे ॥ १४ ॥
जिसका सोऽहं भावका रोक । मोक्ष सुखार्थ बने जो रंक ।
उनकी दृष्टिका हे कलंक । लगेगा तेरे प्रेमको ॥ १५ ॥
इसका अहंभाव जायेगा । यदि यह मैं ही हो जायेगा।
मैं अकेला ही कैसा रहूंगा । सोचता है हरि ॥ १६ ॥
दृष्टिसे देख कर सुखी होना । या सुखसे मनसोक्त बोलना ।
या प्रेमसे आलिंगन करना । किसको फिर ॥ १७ ॥
या अपने मनकी सुंदर । बात कहें किससे मधुर ।
हुआ यदि यह धनुर्धर । मुझमें समरसैक्य ॥ १८ ॥
द्वयनीय भावसे जनार्दन । अन्योपदेश रूपसे ही मान ।
बोलनेमें किया मनमोहन । आलिंगन पार्थका ॥ १९ ॥
सुननेमें यह किंचित्कठिण । फिर भी है यह स्पष्ट ही जान ।
श्रीकृष्ण रूपकी मूर्ति अर्जुन । है ढली हुई ॥ १२० ॥
अर्जुनकी प्रशंसा —
जैसे ही आयूके अंतमें । पुत्रजन्म होता है बांझमें ।
फिर वह मोहत्रयमें । नाचने लगती है ॥ २१ ॥
ऐसा हुआ है अनंत । यह मैं नहीं कहता ।
यदि मैं नहीं देखता । प्रेमातिशय ॥ २२ ॥
१६३ आत्मसंयम-योग

देखो कैसा है यह अचरज । कहां उपदेश औ' कहां झुंज ।
परंतु यहां है प्रेमका भोज । नाचता जो ॥ २३ ॥
अजी ! लाज लज्जा है प्रेममें । तथा थकान है व्यसनमें ।
भ्रम नहीं जो पगलाईमें । यह होगा कैसे ॥ २४ ॥
इसका भावार्थ है ऐसा । पार्थ भक्तिका आश्रयसा ।
सुख श्रंगारके मानस-सा । दर्पण रूपमें ॥ २५ ॥
ऐसा है यह पुण्य पवित्र । विश्वमें भक्ति बीज सुक्षेत्र ।
तभी है श्रीकृष्ण-कृपा पात्र । त्रिभुवनमें ॥ २६ ॥
आत्म निवेदनकी नींवका । आधार पीठ है जो सख्यका ।
पार्थ है अधिष्ठान उसका । मुख्य देवता ॥ २७ ॥
पास ही है प्रभु उसका वर्णन । छोड़ करते हैं भक्त-गुणगान ।
भाता है ऐसा स्वभावका अर्जुन । श्रीहरिको सहज ॥ २८ ॥
भजती जैसे पतिको प्रीतिसे । पाती मान्यता प्रीतिकी पतिसे ।
वर्णन ऐसी सतीका पतिसे । होना स्वाभाविक ॥ २९ ॥
अर्जुनका ऐसा गुणगान । चाहता विशेष मेरा मन ।
त्रिभुवनका भाग्य महान् । पार्थमें बसता ॥ १३० ॥
जिसके प्रेमके कारण । निर्गुण हो आता सगुण ।
तथा सकल गुणपूर्ण । अनुभवता प्रेम-पीड़ा ॥ ३१ ॥
श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान--
कहते तब श्रोता हमारा भाग्य । कैसा बोलना यह सहज योग्य ।
शब्द शोभा आयी पाकर विजय । नाद-ब्रह्मपर ॥ ३२ ॥
आश्चर्यजी गगनमें देश-भाषाके । प्रकार प्रकटते साहित्य रंगके ।
खिल आयी हिंदी ऐसे अलंकारके । वैभवानंदमें ॥ ३३ ॥
छटकी है ज्ञान चांदनी कैसी । भावार्थ दे प्रिय शीतलतासी ।
खिली श्लोकार्थ कुमुदिनी ऐसी । सहज रूपसे ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी १६४