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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 226

इंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य—
अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके ।
तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥
आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके ।
स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥
इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें ।
फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥
देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार ।
जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥
अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित ।
कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥
यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है —
स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना ।
किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥
अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर ।
शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥
होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात ।
आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥
इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन ।
चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥
उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी ।
आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५८