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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 225

जहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता ।
अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥
योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर ।
कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥
यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे ।
प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥
टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका ।
टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥
वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे ।
चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥
पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे ।
ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥
फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ ।
होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥
रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति ।
इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥
इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ ।
हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥
यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥
योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा ।
योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥
न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है ।
संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥
१५७ आत्म-संयमयोग